तरुण कौशिक, संपादक, सर्वव्यापी
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के कलेक्टर पद से डॉ. संतोष देवांगन का लगभग दो माह के भीतर ही हटाया जाना केवल एक सामान्य प्रशासनिक फेरबदल नहीं माना जा रहा है। इस निर्णय ने जिले से लेकर राजधानी रायपुर तक प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं। आम जनता, जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच इस निर्णय को लेकर अलग-अलग तरह की चर्चाएं हो रही हैं।प्रशासनिक सेवा में सामान्यतः अधिकारियों का स्थानांतरण शासन का विशेषाधिकार होता है और इसके पीछे अनेक प्रशासनिक कारण हो सकते हैं। किंतु इतनी कम अवधि में किसी कलेक्टर का स्थानांतरण स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में जिज्ञासा पैदा करता है कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां बनीं जिनके कारण यह निर्णय लिया गया।जिले में यह चर्चा भी सुनाई दे रही है कि क्या स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल के साथ किसी प्रशासनिक मुद्दे पर मतभेद इसका कारण बने? वहीं कुछ लोग यह भी चर्चा कर रहे हैं कि जिले के एक निजी अस्पताल के विरुद्ध की गई कार्रवाई से प्रभावशाली वर्ग नाराज हुआ। दूसरी ओर कुछ प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि वरिष्ठ अधिकारियों के साथ समन्वय और प्रशासनिक कार्यशैली को लेकर भी प्रश्न उठे थे। हालांकि इन चर्चाओं की किसी भी स्तर पर आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और शासन की ओर से स्थानांतरण का कोई विस्तृत कारण सार्वजनिक नहीं किया गया है।यही कारण है कि अटकलों का बाजार गर्म है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता की अपेक्षा रखने वाले लोगों का मानना है कि यदि किसी अधिकारी को इतनी कम अवधि में हटाया जाता है तो कम से कम प्रशासनिक दृष्टि से उसके पीछे के कारण स्पष्ट होने चाहिए, ताकि अनावश्यक भ्रम और चर्चाओं पर विराम लग सके।डॉ. संतोष देवांगन के कार्यकाल के दौरान कई प्रशासनिक निर्णय चर्चा में रहे। कुछ निर्णयों की जनता ने सराहना की, तो कुछ मामलों में विरोध और असहमति भी सामने आई। प्रशासनिक पदों पर कार्यरत अधिकारियों के लिए जनप्रतिनिधियों, शासन और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ समन्वय बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है जितना कानून का पालन सुनिश्चित करना।प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी जिले का कलेक्टर शासन की नीतियों को लागू करने वाली महत्वपूर्ण कड़ी होता है। ऐसे में यदि शासन को लगता है कि किसी जिले में बेहतर प्रशासनिक समन्वय की आवश्यकता है, तो स्थानांतरण भी उसी प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। वहीं दूसरी ओर यदि किसी अधिकारी ने नियमों के तहत कठोर कार्रवाई की हो और उसके कारण विवाद उत्पन्न हुआ हो, तो ऐसे मामलों में तथ्यों का सामने आना भी आवश्यक है।फिलहाल डॉ. संतोष देवांगन के स्थानांतरण को लेकर जितनी चर्चाएं हैं, उससे कहीं अधिक सवाल हैं। क्या यह केवल नियमित प्रशासनिक निर्णय था? क्या इसके पीछे राजनीतिक कारण थे? क्या प्रशासनिक समन्वय की कमी इसकी वजह बनी? अथवा कोई अन्य कारण था, जिसे सार्वजनिक नहीं किया गया?इन सभी प्रश्नों के उत्तर केवल राज्य शासन ही स्पष्ट कर सकता है। जब तक कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आती, तब तक विभिन्न कारणों को तथ्य मानना उचित नहीं होगा। लेकिन इतना अवश्य है कि दो महीने के भीतर कलेक्टर का स्थानांतरण गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के साथ-साथ पूरे छत्तीसगढ़ में चर्चा का विषय बना हुआ है और लोग इस निर्णय के वास्तविक कारण जानने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।


