घोर कलयुग! चुनाव करा सकता है शिक्षक, जनगणना कर सकता है शिक्षक, लेकिन वर्षों तक पढ़ाने के बाद भी टीईटी के बिना नहीं पढ़ा सकता? शिक्षा व्यवस्था पर उठ रहे गंभीर सवाल। - Sarvavyapi घोर कलयुग! चुनाव करा सकता है शिक्षक, जनगणना कर सकता है शिक्षक, लेकिन वर्षों तक पढ़ाने के बाद भी टीईटी के बिना नहीं पढ़ा सकता? शिक्षा व्यवस्था पर उठ रहे गंभीर सवाल। - Sarvavyapi

घोर कलयुग! चुनाव करा सकता है शिक्षक, जनगणना कर सकता है शिक्षक, लेकिन वर्षों तक पढ़ाने के बाद भी टीईटी के बिना नहीं पढ़ा सकता? शिक्षा व्यवस्था पर उठ रहे गंभीर सवाल।

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तरुण कौशिक, संपादक, सर्वव्यापी

देश की शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर बहस के केंद्र में है। वर्षों से विद्यालयों में अध्यापन कर रहे अनेक शिक्षक और शिक्षाकर्मी यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि उन पर चुनाव जैसे लोकतंत्र के सबसे संवेदनशील दायित्व का भरोसा किया जा सकता है, यदि उन्हें जनगणना जैसे राष्ट्रीय महत्व के कार्यों की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है, यदि वे आपदा प्रबंधन से लेकर विभिन्न सरकारी योजनाओं के सफल क्रियान्वयन तक में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, तो फिर 15, 20 या 25 वर्षों के अध्यापन अनुभव के बाद केवल टीईटी (Teacher Eligibility Test) उत्तीर्ण न होने के आधार पर उन्हें पढ़ाने के अयोग्य कैसे माना जा सकता है?यह प्रश्न केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि शिक्षा नीति, अनुभव और योग्यता के बीच संतुलन से जुड़ा एक गंभीर विमर्श है।शिक्षक समाज का निर्माण करता है। वह केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का चरित्र और भविष्य भी गढ़ता है। यही शिक्षक चुनाव के समय मतदान दल का सदस्य बनकर लोकतंत्र की रक्षा करता है। जनगणना के दौरान प्रत्येक घर तक पहुंचकर देश के विकास की आधारभूत जानकारी एकत्र करता है। अनेक सरकारी सर्वेक्षण, सामाजिक योजनाएं और प्रशासनिक दायित्व भी उसी के भरोसे पूरे होते हैं।ऐसे में शिक्षकों का एक वर्ग यह सवाल पूछ रहा है कि जब सरकार उनके अनुभव, ईमानदारी और कार्यक्षमता पर इतने महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्यों के लिए भरोसा करती है, तब केवल एक पात्रता परीक्षा के आधार पर उनके वर्षों के अध्यापन अनुभव को कमतर क्यों माना जाए?हालांकि, इस विषय का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। टीईटी की व्यवस्था इसलिए लागू की गई थी ताकि विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित की जा सके और न्यूनतम शैक्षणिक दक्षता का एक समान मानक स्थापित हो। सर्वोच्च न्यायालय तथा राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE) के दिशा-निर्देशों के अनुरूप कई राज्यों में शिक्षक नियुक्ति के लिए टीईटी अनिवार्य किया गया है। इसका उद्देश्य शिक्षा की गुणवत्ता को मजबूत करना है, न कि अनुभवी शिक्षकों का अपमान करना।फिर भी यह प्रश्न लगातार उठ रहा है कि क्या दशकों तक सफलतापूर्वक पढ़ाने वाले शिक्षकों के अनुभव का कोई स्वतंत्र मूल्यांकन नहीं होना चाहिए? क्या लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों के लिए अलग व्यवस्था, विशेष पात्रता परीक्षण या अनुभव आधारित छूट पर विचार नहीं किया जाना चाहिए? शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अनुभव और गुणवत्ता दोनों का संतुलन बनाना आवश्यक है।छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों में समय-समय पर शिक्षक संगठनों ने यह मांग उठाई है कि लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों के अनुभव को उचित महत्व दिया जाए। उनका कहना है कि यदि किसी शिक्षक ने वर्षों तक विद्यार्थियों को पढ़ाया है और उसका कार्य रिकॉर्ड संतोषजनक है, तो केवल एक परीक्षा के आधार पर उसकी क्षमता का मूल्यांकन करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।वहीं शिक्षा नीति के समर्थकों का तर्क है कि बदलते समय में नई शिक्षण पद्धतियों, बाल मनोविज्ञान, डिजिटल शिक्षा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप शिक्षकों का अद्यतन ज्ञान भी आवश्यक है। इसलिए पात्रता परीक्षा या क्षमता मूल्यांकन की व्यवस्था पूरी तरह समाप्त नहीं की जा सकती।अब आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, शिक्षा विशेषज्ञ, शिक्षक संगठन और नीति निर्माता मिलकर ऐसा संतुलित समाधान खोजें, जिसमें शिक्षा की गुणवत्ता भी बनी रहे और वर्षों तक सेवा देने वाले अनुभवी शिक्षकों के ज्ञान, समर्पण और अनुभव का भी सम्मान हो।आज यह बहस केवल टीईटी तक सीमित नहीं है, बल्कि उस व्यापक प्रश्न से जुड़ी है कि क्या अनुभव और सेवा का मूल्य केवल एक परीक्षा से कम आंका जा सकता है? इसका उत्तर आने वाले समय में शिक्षा व्यवस्था की दिशा तय करेगा।


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