वनमंडल में टीडीआर रिलीज पर उठे सवाल, विभागीय नोटशीट से भुगतान प्रक्रिया पर गहराए संदेह। - Sarvavyapi वनमंडल में टीडीआर रिलीज पर उठे सवाल, विभागीय नोटशीट से भुगतान प्रक्रिया पर गहराए संदेह। - Sarvavyapi

वनमंडल में टीडीआर रिलीज पर उठे सवाल, विभागीय नोटशीट से भुगतान प्रक्रिया पर गहराए संदेह।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के मरवाही वनमंडल की एक विभागीय नोटशीट सामने आने के बाद टेंडर डिपॉजिट रसीद (टीडीआर) रिलीज किए जाने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। विभाग के भीतर इस मामले को लेकर चर्चाओं का दौर तेज है। उपलब्ध दस्तावेज़ में दर्ज टिप्पणियां इस ओर संकेत करती हैं कि संबंधित फर्म के टीडीआर को लेकर विभागीय स्तर पर कई महत्वपूर्ण आपत्तियां दर्ज की गई थीं, इसके बावजूद बाद में राशि जारी किए जाने की प्रक्रिया अपनाई गई। अब यह पूरा मामला विभागीय जांच की मांग कर रहा है।कार्यालयीन टीप-पत्र के अनुसार वित्तीय वर्ष 2020-21 एवं 2021-22 में वानिकी एवं निर्माण कार्यों के लिए वनमंडल स्तर पर निविदा जारी की गई थी। निविदा प्रक्रिया के तहत संबंधित फर्म को विभिन्न कार्यों के लिए पात्र घोषित किया गया और नियमानुसार टीडीआर जमा कराया गया। कार्य पूर्ण होने तथा भुगतान हो जाने के बाद फर्म द्वारा टीडीआर रिलीज करने का आवेदन प्रस्तुत किया गया। नोटशीट में यह भी उल्लेख है कि निर्धारित दर से कम दर पर कार्य स्वीकृत होने के कारण अंतर की राशि टीडीआर के रूप में जमा की गई थी, जिसे वापस किए जाने का प्रस्ताव तैयार किया गया।मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू विभागीय नोटशीट पर दर्ज हस्तलिखित टिप्पणियां हैं। इनमें स्पष्ट रूप से पूछा गया है कि माइनर मिनरल एवं रॉयल्टी से संबंधित समस्त देयताओं का निराकरण हुआ है या नहीं। साथ ही संबंधित कार्य के टीडीआर को आवश्यक परीक्षण के बाद ही आगे बढ़ाने का उल्लेख भी किया गया है। इन टिप्पणियों से यह प्रतीत होता है कि भुगतान से पहले विभागीय स्तर पर रॉयल्टी एवं अन्य वित्तीय देयताओं को लेकर गंभीर शंकाएं मौजूद थीं।विभागीय कर्मचारियों का कहना है कि प्रारंभिक स्तर पर इन्हीं आपत्तियों के कारण टीडीआर रिलीज की प्रक्रिया रोक दी गई थी, ताकि पहले सभी बिंदुओं का परीक्षण और सत्यापन हो सके। हालांकि बाद में परिस्थितियां बदलीं और संबंधित टीडीआर जारी कर दिया गया। कर्मचारियों के बीच अब यही निर्णय चर्चा और सवालों का विषय बना हुआ है।इस पूरे प्रकरण ने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यदि रॉयल्टी अथवा अन्य शासकीय देयताओं को लेकर विभागीय स्तर पर संदेह दर्ज था, तो क्या संबंधित विभागों से विधिवत सत्यापन कराया गया था? क्या सभी आपत्तियों का निराकरण होने के बाद ही टीडीआर रिलीज किया गया? क्या सक्षम अधिकारी से नियमानुसार अनुमति प्राप्त की गई थी? यदि ऐसा हुआ तो उसके दस्तावेज़ क्या हैं, और यदि नहीं हुआ तो भुगतान किस आधार पर किया गया?विभागीय सूत्रों का मानना है कि यदि इस पूरे मामले की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराई जाती है तो फाइल नोटिंग, अनुमोदन, परीक्षण रिपोर्ट और भुगतान से जुड़े सभी दस्तावेज़ सामने आ सकते हैं, जिससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि टीडीआर रिलीज की प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के अनुरूप थी या नहीं। चूंकि मामला शासकीय धन और वित्तीय जवाबदेही से जुड़ा है, इसलिए पारदर्शिता की दृष्टि से इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक मानी जा रही है। वहीं सर्वव्यापी इस विभाग की और भी भ्रष्टाचार की खुलासा करेगी…!


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