मंत्रालय में संवादहीनता पर उठे सवाल: मंत्रियों के विशेष सहायकों के व्यवहार से बढ़ रही नाराज़गी, मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव से अपेक्षित हस्तक्षेप। - Sarvavyapi मंत्रालय में संवादहीनता पर उठे सवाल: मंत्रियों के विशेष सहायकों के व्यवहार से बढ़ रही नाराज़गी, मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव से अपेक्षित हस्तक्षेप। - Sarvavyapi

मंत्रालय में संवादहीनता पर उठे सवाल: मंत्रियों के विशेष सहायकों के व्यवहार से बढ़ रही नाराज़गी, मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव से अपेक्षित हस्तक्षेप।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ विधानसभा सत्र के दौरान मंत्रालय की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक संवाद व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर चर्चा सामने आई है। विधानसभा परिसर में उच्च प्रशासनिक अधिकारियों के बीच हुई अनौपचारिक बातचीत में यह मुद्दा प्रमुखता से उभरकर सामने आया कि मंत्रालय में पदस्थ कुछ वरिष्ठ अधिकारी तथा मंत्रियों के विशेष सहायक, जो डिप्टी कलेक्टर एवं संयुक्त कलेक्टर जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों से संबद्ध हैं, आम नागरिकों, जनप्रतिनिधियों, पत्रकारों और सामाजिक संगठनों द्वारा भेजे गए सामान्य शिष्टाचार संदेशों का भी उत्तर देना आवश्यक नहीं समझते। बताया जाता है कि इस विषय पर एक वरिष्ठ आईपीएस तथा एक वरिष्ठ आईएफएस स्तर के अधिकारी ने भी विधानसभा परिसर में चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि प्रशासनिक व्यवस्था में संवाद का अभाव शासन और जनता के बीच विश्वास की दूरी बढ़ा सकता है।सूत्रों के अनुसार, मंत्रालय में पदस्थ अनेक विशेष सहायकों की भूमिका केवल कार्यालयीन समन्वय तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वे मंत्री कार्यालय और आम नागरिकों के बीच महत्वपूर्ण कड़ी भी होते हैं। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति केवल औपचारिक रूप से व्हाट्सएप पर “नमस्कार” या किसी आवश्यक विषय पर संदेश भेजता है और उसका उत्तर तक नहीं मिलता, तो इससे संबंधित व्यक्ति के मन में शासन और प्रशासन की संवेदनशीलता को लेकर नकारात्मक संदेश जाता है।प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि किसी भी अधिकारी या विशेष सहायक के लिए प्रत्येक संदेश का विस्तृत उत्तर देना संभव नहीं हो सकता, लेकिन कम से कम औपचारिक अभिवादन या आवश्यक संदेश की प्राप्ति की पुष्टि करना भी प्रशासनिक शिष्टाचार का हिस्सा माना जाता है। डिजिटल युग में व्हाट्सएप, ईमेल और अन्य माध्यमों से संवाद सरकारी कार्यसंस्कृति का महत्वपूर्ण अंग बन चुके हैं। ऐसे में संवादहीनता की प्रवृत्ति प्रशासन की सकारात्मक छवि को प्रभावित कर सकती है।विधानसभा परिसर में चर्चा के दौरान यह भी कहा गया कि राज्य सरकार सुशासन, पारदर्शिता और जनसंपर्क को प्राथमिकता देने की बात करती है। यदि मंत्री कार्यालयों में कार्यरत अधिकारी और विशेष सहायक आम लोगों से संवाद स्थापित करने में रुचि नहीं दिखाते, तो सरकार की मंशा और जमीनी व्यवहार के बीच अंतर दिखाई देता है। इससे आम नागरिकों, पत्रकारों तथा सामाजिक संगठनों में असंतोष की भावना उत्पन्न होना स्वाभाविक माना जा रहा है।प्रशासनिक हलकों में यह अपेक्षा भी व्यक्त की जा रही है कि मुख्य सचिव विकास शील तथा मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह इस विषय को गंभीरता से लेते हुए मंत्रालय की कार्यसंस्कृति में संवाद और शिष्टाचार को और अधिक सुदृढ़ बनाने की दिशा में आवश्यक मार्गदर्शन जारी करें। वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि अधिकारी का पद केवल प्रशासनिक अधिकार का प्रतीक नहीं, बल्कि संवेदनशील व्यवहार और जनसंपर्क का भी दायित्व है।हालांकि, यह भी उल्लेखनीय है कि इस संबंध में किसी विशेष अधिकारी या विशेष सहायक का नाम सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है और न ही संबंधित अधिकारियों की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त हुई है। इसलिए इन चर्चाओं को स्वतंत्र रूप से सत्यापित किया जाना शेष है। यदि शासन स्तर पर इस विषय में कोई स्पष्टीकरण या निर्देश जारी किए जाते हैं, तो उससे मंत्रालय की कार्यप्रणाली और जनसंवाद व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाने में सहायता मिल सकती है।


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