बिल्हा के कुर्मी समाज में बढ़ती नाराजगी: भाजपा-कांग्रेस दोनों सरकारों में सामान्य और सक्रिय कार्यकर्ताओं की अनदेखी, निगम-मंडल से लेकर मंडी तक नहीं मिला नेतृत्व। - Sarvavyapi बिल्हा के कुर्मी समाज में बढ़ती नाराजगी: भाजपा-कांग्रेस दोनों सरकारों में सामान्य और सक्रिय कार्यकर्ताओं की अनदेखी, निगम-मंडल से लेकर मंडी तक नहीं मिला नेतृत्व। - Sarvavyapi

बिल्हा के कुर्मी समाज में बढ़ती नाराजगी: भाजपा-कांग्रेस दोनों सरकारों में सामान्य और सक्रिय कार्यकर्ताओं की अनदेखी, निगम-मंडल से लेकर मंडी तक नहीं मिला नेतृत्व।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ में लंबे समय से राजनीतिक रूप से सक्रिय कुर्मी समाज के बीच अब यह चर्चा तेज होती जा रही है कि सत्ता परिवर्तन चाहे भाजपा की सरकार रही हो या कांग्रेस की, समाज के जमीनी और समर्पित कार्यकर्ताओं को अपेक्षित सम्मान और प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया। समाज के अनेक लोगों का मानना है कि वर्षों तक संगठन और चुनाव में मेहनत करने वाले सामान्य कार्यकर्ताओं को निगम, मंडल, आयोग, बोर्ड तथा मंडी जैसे महत्वपूर्ण पदों पर पर्याप्त अवसर नहीं मिले।बिलासपुर जिले के बिल्हा विधानसभा क्षेत्र के कुर्मीसमाज के कई लोगों का कहना है कि चुनाव के समय कुर्मी समाज के कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर पार्टी के लिए काम करते हैं, लेकिन जब जिम्मेदार पदों पर नियुक्तियों का समय आता है तो अक्सर ऐसे लोगों को प्राथमिकता मिल जाती है, जिन्हें समाज के बीच लंबे समय तक सक्रिय नहीं माना जाता। इससे जमीनी कार्यकर्ताओं में निराशा और असंतोष बढ़ रहा है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी समाज का वास्तविक नेतृत्व तभी मजबूत होता है जब वर्षों से संगठन में काम कर रहे समर्पित लोगों को जिम्मेदारी दी जाए। यदि नियुक्तियों में सक्रिय कार्यकर्ताओं की लगातार उपेक्षा होती है तो उसका असर संगठन की मजबूती और कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी पड़ सकता है।बिलासपुर के बिल्हा विधानसभा क्षेत्र के कुर्मी समाज के कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि समाज को केवल चुनावी समर्थन तक सीमित नहीं समझा जाना चाहिए। उनका मानना है कि यदि समाज के योग्य, शिक्षित और सक्रिय लोगों को निगम, मंडल, आयोग, बोर्ड और मंडी जैसे संस्थानों में नेतृत्व का अवसर मिले तो वे शासन की योजनाओं को बेहतर ढंग से समाज तक पहुंचाने के साथ-साथ जनहित के कार्यों को भी प्रभावी बना सकते हैं।समाज के भीतर यह भी आवाज उठ रही है कि अब समय आ गया है जब राजनीतिक दल नियुक्तियों में केवल व्यक्तिगत समीकरणों या सिफारिशों के बजाय कार्यकर्ताओं की सक्रियता, अनुभव, सामाजिक योगदान और संगठन के प्रति समर्पण को प्राथमिकता दें। उनका मानना है कि इससे समाज में विश्वास बढ़ेगा और नई पीढ़ी भी राजनीति में सकारात्मक भागीदारी के लिए प्रेरित होगी।हालांकि, यह ध्यान रखना आवश्यक है कि नियुक्तियों को लेकर व्यक्त की जा रही ये बातें विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की राय और असंतोष को दर्शाती हैं। किसी भी राजनीतिक दल की आधिकारिक नीति या नियुक्ति प्रक्रिया पर निष्कर्ष निकालने के लिए संबंधित पक्ष का दृष्टिकोण भी महत्वपूर्ण होगा। यदि इस विषय पर भाजपा, कांग्रेस या संबंधित पदाधिकारियों का पक्ष उपलब्ध होता है, तो उसे भी समाचार में प्रमुखता से शामिल किया जाना चाहिए ताकि संतुलित पत्रकारिता सुनिश्चित हो सके।


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