रजिस्ट्रार की मुहर से खत्म हुआ विवाद! सीडीबीई की नई कार्यकारिणी को मिली कानूनी मान्यता, झूठे प्रचार की खुली पोल। - Sarvavyapi रजिस्ट्रार की मुहर से खत्म हुआ विवाद! सीडीबीई की नई कार्यकारिणी को मिली कानूनी मान्यता, झूठे प्रचार की खुली पोल। - Sarvavyapi

रजिस्ट्रार की मुहर से खत्म हुआ विवाद! सीडीबीई की नई कार्यकारिणी को मिली कानूनी मान्यता, झूठे प्रचार की खुली पोल।

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नूर मोहम्मद,रायपुर (सर्वव्यापी)

छत्तीसगढ़ डायोसिस बोर्ड ऑफ एजुकेशन (CDBE) को लेकर पिछले कई महीनों से चल रहे विवाद पर आखिरकार सरकारी रजिस्ट्रार की मुहर लग गई है। फर्म एवं संस्थाएं, छत्तीसगढ़ के रजिस्ट्रार द्वारा जारी आदेश के बाद प्रशासन की निगरानी में संपन्न चुनाव से गठित नई कार्यकारिणी को विधिसम्मत मान्यता मिल गई है। इसके साथ ही संस्था के खिलाफ चलाए जा रहे कथित भ्रामक प्रचार और दावों की भी हवा निकल गई है।प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, जिला प्रशासन द्वारा नियुक्त प्रशासक की निगरानी में 27 मार्च 2026 को निष्पक्ष चुनाव कराया गया था। चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद अभिलेखों के परीक्षण उपरांत नव-निर्वाचित कार्यकारिणी को रजिस्ट्रार कार्यालय में विधिवत दर्ज कर लिया गया है। हालांकि, यह व्यवस्था उच्च न्यायालय, बिलासपुर में लंबित प्रकरण के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगी।कौन हैं मान्यता प्राप्त पदाधिकारीरजिस्ट्रार के आदेश के अनुसार वैध कार्यकारिणी में —अध्यक्ष – राइट रेव्ह. युवोन कुमारउपाध्यक्ष – नीतिन लॉरेंससचिव – जयप्रदीप रॉबिनसनकोषाध्यक्ष – प्रवीण मसीहसदस्य – अमित दास, तर्जा पॉल एवं सुशील मसीह शामिल हैं।”झूठे दस्तावेज और भ्रामक प्रचार” का आरोपसीडीबीई ने प्रेस विज्ञप्ति में दावा किया है कि कुछ व्यक्तियों द्वारा संस्था और उसके विद्यालयों को बदनाम करने के लिए लगातार झूठे दस्तावेज, मिथ्या आरोप और भ्रामक समाचार प्रसारित किए जा रहे थे। संस्था का कहना है कि रजिस्ट्रार के ताजा आदेश ने इन दावों को निराधार साबित कर दिया है।संस्था ने विशेष रूप से कहा है कि शिक्षा, विद्यार्थियों और अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं की गरिमा को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करने वालों के विरुद्ध आवश्यक होने पर कानूनी कार्रवाई भी की जाएगी।समाज से की अपीलसीडीबीई ने अभिभावकों, शिक्षकों, कर्मचारियों और समाज के लोगों से अपील की है कि वे किसी भी प्रकार की अफवाह, अपुष्ट दस्तावेज या भ्रामक प्रचार पर भरोसा न करें और केवल सक्षम न्यायालय एवं वैधानिक प्राधिकरणों द्वारा जारी आदेशों को ही प्रमाणिक मानें।यह मामला केवल एक संस्था के चुनाव का नहीं, बल्कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं के प्रशासन, कानूनी वैधता और पारदर्शिता से जुड़ा विषय है। रजिस्ट्रार के आदेश के बाद अब सवाल यह भी उठता है कि यदि वास्तव में झूठे दस्तावेज और भ्रामक प्रचार किए गए थे, तो संबंधित लोगों के खिलाफ क्या कानूनी कार्रवाई होगी? वहीं, उच्च न्यायालय में लंबित मामले के अंतिम निर्णय पर भी सभी की नजरें टिकी रहेंगी।


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