17 वर्षों से शहीद अश्विनी प्रधान के सम्मान की मांग अधूरी: तीन सरकारें बदलीं, लेकिन आदिवासी शहीद के नाम पर आज तक नहीं हुआ किसी सरकारी संस्था का नामकरण। - Sarvavyapi 17 वर्षों से शहीद अश्विनी प्रधान के सम्मान की मांग अधूरी: तीन सरकारें बदलीं, लेकिन आदिवासी शहीद के नाम पर आज तक नहीं हुआ किसी सरकारी संस्था का नामकरण। - Sarvavyapi

17 वर्षों से शहीद अश्विनी प्रधान के सम्मान की मांग अधूरी: तीन सरकारें बदलीं, लेकिन आदिवासी शहीद के नाम पर आज तक नहीं हुआ किसी सरकारी संस्था का नामकरण।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

नक्सली हमले में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले बिलासपुर निवासी आदिवासी समाज के शहीद अश्विनी प्रधान के सम्मान में किसी सरकारी संस्था का नामकरण अथवा प्रतिमा स्थापना की मांग पिछले कई वर्षों से लगातार उठाई जा रही है, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की भाजपा सरकार, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की कांग्रेस सरकार और अब मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के कार्यकाल में भी यह मांग पूरी नहीं हो सकी है। इससे शहीद के परिजनों और आदिवासी समाज में लगातार उपेक्षा की भावना बनी हुई है।छत्तीसगढ़िया एकता मंच द्वारा वर्ष 2022 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल एवं तत्कालीन गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू को ज्ञापन सौंपकर मांग की गई थी कि बिलासपुर के इंदिरा कॉलोनी, तारबाहर निवासी शहीद अश्विनी प्रधान के नाम पर किसी शासकीय संस्था का नामकरण किया जाए तथा शहर के किसी प्रमुख चौक-चौराहे पर उनकी प्रतिमा स्थापित कर उन्हें सम्मान दिया जाए। इससे पहले भी यही मांग तत्कालीन डॉ. रमन सिंह सरकार के समक्ष कई बार रखी गई थी। वर्तमान में भी मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सरकार को लगातार ज्ञापन देकर यही मांग दोहराई जा रही है, लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया है।ज्ञापन के अनुसार बिलासपुर के इंदिरा कॉलोनी, तारबाहर निवासी स्वर्गीय सुरत लाल प्रधान के पुत्र अश्विनी प्रधान 24 मार्च 2009 को बस्तर संभाग के नारायणपुर जिले में नक्सली हमले में शहीद हो गए थे। देश की सुरक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले इस जवान के सम्मान में उनके मोहल्ले के शासकीय विद्यालय का नामकरण किए जाने की मांग वर्षों से की जा रही है, लेकिन आज तक इसे स्वीकार नहीं किया गया।इस बीच इंदिरा कॉलोनी स्थित शासकीय विद्यालय को आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम विद्यालय में परिवर्तित कर उसका नामकरण क्षेत्र के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता एवं कांग्रेस नेता स्वर्गीय शेख गब्बर के नाम पर कर दिया गया। इस पर किसी प्रकार का विरोध नहीं किया गया, लेकिन शहीद अश्विनी प्रधान के नाम पर अब तक किसी भी शासकीय संस्था, सड़क, चौक या सार्वजनिक स्थल का नामकरण नहीं होने से उनके सम्मान का प्रश्न लगातार बना हुआ है।छत्तीसगढ़िया एकता मंच का कहना है कि प्रदेश में शहीदों के सम्मान की बात लगातार की जाती है और आदिवासी समाज के विकास एवं सम्मान के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन बिलासपुर जैसे प्रदेश के दूसरे सबसे बड़े शहर में एक आदिवासी शहीद के नाम पर आज तक किसी सरकारी संस्था का नामकरण नहीं होना गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। संगठन का कहना है कि यह केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे आदिवासी समाज के सम्मान का विषय है।विशेष रूप से वर्तमान सरकार को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय स्वयं आदिवासी समुदाय से आते हैं। ऐसे में आदिवासी समाज के एक शहीद जवान को सम्मान दिलाने की वर्षों पुरानी मांग पर अब तक निर्णय नहीं होना अनेक प्रश्नों को जन्म दे रहा है। संगठन का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में आदिवासी समाज के सम्मान और शहीदों के गौरव की पक्षधर है, तो उसे बिना किसी विलंब के शहीद अश्विनी प्रधान के नाम पर किसी प्रमुख शासकीय संस्था का नामकरण करना चाहिए तथा बिलासपुर में उनकी प्रतिमा स्थापित कर उन्हें स्थायी सम्मान देना चाहिए।छत्तीसगढ़िया एकता मंच ने स्पष्ट किया है कि यह मांग किसी राजनीतिक दल के विरोध या समर्थन का विषय नहीं, बल्कि देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले एक आदिवासी शहीद के सम्मान से जुड़ा प्रश्न है। संगठन का कहना है कि तीन-तीन सरकारें बदल जाने के बावजूद यदि एक शहीद को उसका उचित सम्मान नहीं मिल पाता है, तो यह शासन-प्रशासन की संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।


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