तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग में स्थानांतरण पर शासन द्वारा प्रतिबंध लागू होने के बावजूद विभाग में लगातार एकल (सिंगल) स्थानांतरण आदेश जारी होने का मामला अब गंभीर विवाद का विषय बनता जा रहा है। सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत प्राप्त जानकारी ने इस पूरे मामले पर कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं। प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार विभाग में स्थानांतरण पर प्रतिबंध प्रभावी है, लेकिन इसके बाद भी लगातार ऑफलाइन माध्यम से सामान्य हस्ताक्षरयुक्त स्थानांतरण आदेश जारी किए जा रहे हैं।सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब शासन की स्पष्ट नीति स्थानांतरण पर रोक की है, तब आखिर किस अधिकार और किसकी अनुमति से एक-एक कर स्थानांतरण आदेश जारी किए जा रहे हैं? विभागीय सूत्रों के अनुसार इन आदेशों में विभाग के अवर सचिव आर. पी. वर्मा के डिजिटल ऑनलाइन हस्ताक्षर का उपयोग नहीं किया जा रहा है, बल्कि सामान्य स्वलिखित हस्ताक्षर के साथ ऑफलाइन आदेश जारी किए जा रहे हैं। इससे पूरे मामले की पारदर्शिता और वैधानिकता पर सवाल उठने लगे हैं।सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी यह संकेत देती है कि विभाग में स्थानांतरण प्रतिबंध अभी भी प्रभावी है। इसके बावजूद यदि लगातार आदेश जारी हो रहे हैं तो यह केवल प्रशासनिक विसंगति नहीं बल्कि शासन की स्थानांतरण नीति की खुली अवहेलना भी मानी जा सकती है। यदि कुछ विशेष परिस्थितियों में स्थानांतरण किए जा रहे हैं तो उनकी स्पष्ट स्वीकृति, नियम और आधार सार्वजनिक किए जाने चाहिए।बताया जा रहा है कि इस पूरे मामले की जानकारी मुख्यमंत्री सचिवालय तक भी पहुंच चुकी है। इसके बावजूद अब तक किसी प्रकार की जांच, स्पष्टीकरण या कार्रवाई सामने नहीं आना कई सवालों को जन्म दे रहा है। यदि सरकार सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही की बात करती है तो फिर इस मामले में चुप्पी क्यों है? क्या नियम केवल सामान्य कर्मचारियों के लिए हैं और कुछ मामलों में उन्हें दरकिनार किया जा सकता है?शिक्षक संगठनों और कर्मचारियों के बीच भी इस मुद्दे को लेकर असंतोष बढ़ता जा रहा है। उनका कहना है कि यदि स्थानांतरण पर प्रतिबंध है तो उसका पालन सभी पर समान रूप से होना चाहिए। यदि प्रतिबंध हटाया गया है तो शासन को उसका औपचारिक आदेश सार्वजनिक करना चाहिए। अन्यथा चुनिंदा लोगों के स्थानांतरण से पक्षपात और प्रभाव के आरोप लगना स्वाभाविक है।अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय सरकार इस मामले की निष्पक्ष जांच कराएगी? क्या यह पता लगाया जाएगा कि प्रतिबंध के बावजूद जारी हुए स्थानांतरण आदेश किन परिस्थितियों में और किसके निर्देश पर जारी किए गए? क्या संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी या यह मामला भी अन्य विवादों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा?सूचना के अधिकार से सामने आए इस खुलासे ने स्कूल शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। अब सरकार के सामने चुनौती केवल जवाब देने की नहीं, बल्कि यह साबित करने की भी है कि उसकी घोषित नीतियों का पालन वास्तव में हो रहा है या नहीं। यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो दोषियों पर कार्रवाई होना सुशासन की कसौटी होगी, अन्यथा “प्रतिबंध” केवल कागजों तक सीमित और “स्थानांतरण” प्रभावशाली लोगों की सुविधा का माध्यम बनकर रह जाएगा।


