आईए, जाने अपने सेनसेई को — रमाकांत एस मिश्र।

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बिलासपुर /तरुण कौशिक /संपादक सर्वव्यापी/ छत्तीसगढ़ के मुंगेली जनपद के ग्राम सरगांव की पुण्य धरा से उदित रमाकांत एस. मिश्र की जीवनगाथा केवल आत्मचरित नहीं, अपितु एक आदर्श की स्थापना है। यह कथा एक साधारण ग्रामवासी के असाधारण पुरुषार्थ, अनुपम सेवा-भावना, और राष्ट्र के प्रति अटूट निष्ठा की दैदीप्यमान अभिव्यक्ति है। मिश्र का जीवनचरित्र संकल्पशक्ति, तपस्या और नैतिक उत्थान की त्रिवेणी का अद्भुत संगम है।डाकुओं से मुठभेड़ – अप्रतिम शौर्य की अमिट छाप:अपनी जान की परवाह न करते हुए, रमाकांत मिश्र ने एक अवसर पर समस्त ग्रामवासियों की जान-माल की रक्षा हेतु डाकुओं के सुसंगठित गिरोह से सीधे संघर्ष किया। वे न केवल निर्भीकता से लड़े, बल्कि पूरे ग्राम को डकैती व चोरी की संभावित त्रासदी से मुक्त करा दिया। यह साहसिक कृत्य उनके अंतर्मन में अंतर्निहित राष्ट्रधर्म, सामाजिक उत्तरदायित्व और व्यक्तिगत त्याग का प्रतीक था। इस अद्वितीय वीरता हेतु उन्हें पुलिस प्रोत्साहन पुरस्कार से अलंकृत किया गया, तत्पश्चात मुख्यमंत्री शौर्य पुरस्कार प्रदान किया गया, और अन्ततः इस शौर्यगाथा की राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिध्वनि हुई जब मध्यप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल भाई महावीर के करकमलों द्वारा उन्हें ‘राष्ट्रीय रेड एंड व्हाइट ब्रेवरी अवार्ड’ प्रदान किया गया।कराटे, ताइक्वांडो, नानबूडो और कबड्डी जैसे विविध खेलों में श्री मिश्र की सहभागिता राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पटल पर रही है। कराटे में 100 से अधिक बार राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिभाग कर उन्होंने यह सिध्द किया कि ग्रामीण अंचल की धरती भी वैश्विक स्तर पर गौरव का स्तम्भ रच सकती है। उनका NCC ‘A’ सर्टिफिकेट, ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी कबड्डी प्रतिभागिता, और ताइक्वांडो-नानबूडो में राष्ट्रीय स्तर की उपस्थिति, बहुश्रुत वैदुष्य और अनुशासन का परिचायक है।पांच विषयों में परास्नातक तथा विधि, शिक्षा एवं पुस्तकालय विज्ञान में स्नातक उपाधि धारक रमाकांत मिश्र, ज्ञान की त्रिवेणी को अपने जीवन में आत्मसात करते हैं। उनकी शैक्षिक सम्पन्नता केवल डिग्रियों का संकलन नहीं, अपितु ज्ञान का व्यावहारिक उपयोग कर समाजोपयोगी दिशा में उसका संप्रेषण है।जल जीवन है – यह वाक्य उन्होंने केवल उच्चारा नहीं, अपितु उसे जीया है। 400 से अधिक जनों की जीवनरक्षा हेतु उन्होंने जिस सजगता से जल संकट की समयोचित पहचान कर ग्रामीण अंचलों में जल संरक्षण अभियान का सूत्रपात किया, वह भारतीय संस्कृति में निहित ‘अप्सु अंतः प्राणाः’ की चेतना को पुनः जागृत करता है। राष्ट्रीय स्तर पर जल संसाधन के क्षेत्र में योगदान हेतु उन्हें जल संरक्षण पुरस्कार से सम्मानित किया गया , यह उनकी सतत साधना का प्रतिफल है !पिछले 27 वर्षों से महिलाओं एवं किशोरियों को आत्मरक्षा प्रशिक्षण प्रदान कर वे न केवल सामाजिक संरचना में बदलाव लाने में सहायक रहे हैं, अपितु उन्होंने स्त्री-शक्ति को ‘या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता’ के रूप में प्रतिष्ठित करने का बीड़ा उठाया है। आत्मरक्षा के साथ उन्होंने राष्ट्रप्रेम, अनुशासन और स्वाभिमान के बीज भी रोपे हैं।भारत सरकार के नेहरू युवा केंद्र द्वारा प्रदत्त सर्वश्रेष्ठ युवा पुरस्कार के प्रापक रमाकांत जी युवाओं के चरित्र निर्माण में संलग्न हैं। वे केवल प्रशिक्षक नहीं, अपितु मानसिक सशक्तिकरण के यज्ञकर्ता हैं, जिनके विचार, कर्म और आचरण स्वयं में एक पाठशाला हैं।सम्मान समारोहों में सहभागिता हेतु उनका दृष्टिकोण निःस्वार्थ प्रेरणा पर आधारित है। वे पुरस्कार की आकांक्षा से नहीं, अपितु ‘न दानं, न याचनं, केवलं प्रेरणायाः संप्रेषणं’ के भाव से उपस्थित होते हैं। आत्मप्रचार से विमुख यह दृष्टिकोण आधुनिक युग की विस्मृत नैतिकता को पुनः जाग्रत करता है।रमाकांत एस. मिश्र की जीवनगाथा ‘तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व’ के आदर्श को मूर्त रूप देती है। वे कर्म, ज्ञान, सेवा और राष्ट्रभक्ति के अद्वितीय समागम हैं। उनकी प्रेरणा केवल छत्तीसगढ़ की माटी तक सीमित नहीं, अपितु सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए चेतना-दीप है। युवा यदि उनके जीवन से दिशा लें, तो एक सशक्त, सजग और समर्पित राष्ट्र की संरचना संभव है।


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