छत्तीसगढ़ी को बढ़ावा देने वाले आयोग को क्यों भूली विष्णु सरकार..? उम्रदराज नहीं इस बार युवा को मिले मौका।

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तरुण कौशिक /संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की कोशिशों के लिए बने छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग को जहां एक ओर पूर्व कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भूलकर इस आयोग में पूर्व विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत द्वारा पत्र लिखने के बाद भी पांच साल तक कांग्रेस सरकार ने नियुक्ति नहीं कर सकी तो वहीं वर्तमान भाजपा सरकार के मुखिया विष्णु देव साय भी छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग को पूरी तरह से भूल चुका है और संस्कृति विभाग के अधीन यह आयोग मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के पास होने के बाद भी अब तक इस आयोग में नियुक्ति न हो पाना जहां छत्तीसगढ़ियों के लिए शर्म की बात है तो दूसरी तरफ भाजपा सरकार के लिए बहुत ही शर्मनाक बात है क्योंकि कांग्रेस सरकार में नियुक्ति न होने पर विपक्ष में रहते हुए भाजपा इस मुद्दे पर कांग्रेस को जमकर घेरते रही है लेकिन अब खुद की सरकार में इस आयोग में नियुक्ति नही कर पाना हास्यास्पद है। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग में अध्यक्ष की नियुक्ति के अभाव में छत्तीसगढ़ी राजभाषाओं के उत्थान का काम विशेष रूप से प्रभावित हो रहा है। छत्तीसगढ़ी साहित्यकारों की कृतियों का प्रकाशन नहीं हो पा रहा है। इसकी वजह से साहित्यकार अपनी रचनाओं को गति नहीं दे पा रहे हैं।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को राजभाषा आयोग में शीघ्र ही अध्यक्ष की नियुक्ति की कार्यवाही करने की आवश्यकता है। बताते चलें कि कि डॉ रमन सिंह सरकार के कार्यकाल के समय वर्ष 2007 में स्थापित छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग में अध्यक्ष का पद 2018 से रिक्त है। दिसम्बर 2018 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने सत्ता संभाली लेकिन आयोग में नियुक्ति पर किसी का ध्यान नहीं गया। 2018 तक चर्चित छत्तीसगढ़ी साहित्यकार डॉ. विनय कुमार पाठक राजभाषा आयोग के अध्यक्ष थे, जो अध्यक्षीय कार्यकाल में आयोग के मद से खुद की किताबों का प्रकाशन कराकर विवादों में घिरे हुए हैं। डॉ. पाठक से पहले दानेश्वर शर्मा आयोग के अध्यक्ष थे। छत्तीसगढ़ी साहित्यकार और पत्रकार श्यामलाल चतुर्वेदी इस आयोग के पहले अध्यक्ष थे। यह सभी नियुक्ति डॉ रमन सिंह सरकार में हुई थी और इस नियुक्ति में ब्राह्मणों को अध्यक्ष बनाए जाने से इसे ब्राह्मण समाज का आयोग का नाम भी दिया जा चुका है। वहीं वर्तमान में भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के पास संस्कृति विभाग है लेकिन संस्कृति विभाग के अधीन होने के बाद भी छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग में अध्यक्ष पद की नियुक्ति आज तक नहीं होना मुख्यमंत्री के लिए शर्म की बात मानी जा रही है।

आखिर क्या कारण है कि इस आयोग में खुद मुख्यमंत्री विष्णु देव साय नियुक्ति करने में असमर्थ नजर आ रहे हैं। राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि इस आयोग में 65-70 वर्ष पार उम्रदराज साहित्यकार एवं सेवानिवृत्त न्यायाधीश, विधायक के करीबी रिश्तेदार एवं विशेष कर ब्राह्मण समाज से ही लगभग 45 दावेदार अध्यक्ष हैं और सभी उम्रदराज साहित्यकार , वरिष्ठ नागरिक हैं ,बताया जा रहा है कि इसमें दो चार युवा चेहरे हैं जो भी प्रमुख दावेदार के रुप में शामिल है लेकिन इतने दावेदार होने के बाद छत्तीसगढ़ी भाषा को बढ़ाने के लिए और आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग में अध्यक्ष, सदस्य की नियुक्ति नहीं किए जाने से ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस सरकार की भांति खुद की भाजपा सरकार में छत्तीसगढ़ी भाषा को राजभाषा का दर्जा देने और इसके विकास के लिए गठित छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग को न केवल मुख्यमंत्री विष्णु देव साय बल्कि पूरी भाजपा सरकार और संगठन भूल गई है, शायद यही वजह है कि अब तक इस आयोग में नियुक्ति नहीं हो सकी।


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