विकास नंद/ सर्वव्यापी/
महासमुंद जिले सहित सरायपाली में धड़ल्ले से प्राइवेट स्कूलों की संख्या हर वर्ष बढ़ रही है अगर इनकी सही ढंग से जांच की जाए तो पता चलेगा की शासन के गाइडलाइंस को दरकिनार कर स्कूल संचालित हो रहे हैं वहीं शिक्षा विभाग प्राइवेट स्कूल खोलने के लिए धड़ाधड़ परमिशन देते जा रही है। आप को बता दें कि शिक्षा विभाग के अधिकारी बिना जांच किए परमिशन दे रहे हैं जिले के कई ऐसे स्कूल हैं,जो गाईड लाईन पालन नहीं कर रहे है।
अधिकांश स्कूलों के पास खुद के भवन तक नहीं हैं। ये स्कूल किराए के भवन में या किराए की शटरों में चल रहे हैं। इन भवनों में छात्रों को बैठने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। छोटे-छोटे कमरों में कक्षा संचालित की जा रही हैं। कक्षा में पर्याप्त प्रकाश की व्यवस्था नहीं है। इसी तरह अधिकांश स्कूलों में खेलकूद की व्यवस्था के लिए मैदान नहीं है। शहर सहित आसपास के क्षेत्र में कुछ स्कूल ऐसे है,जो निजी मकानों में दो-दो कमरों में संचालित हो रहे हैं, जबकि उनके पास 10वीं से 12वीं तक की मान्यता है। संचालित कई स्कूलों में छात्र-छात्राओं के अलग अलग टॉयलेट की व्यवस्था नहीं है।
इन स्कूलों में छात्रों के लिए लाइब्रेरी व्यवस्था तक नहीं है। क्षेत्र के अधिकतर स्कूलों के पास अग्निशमन यंत्र भी नहीं है। यदि शासन द्वारा निर्धारित मापदंड का प्राइवेट संस्था पालन नहीं करती है तो उसकी मान्यता समाप्त करने के सख्त निर्देश हैं, लेकिन स्थानीय शिक्षा एवं विकासखंड अधिकारी इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं।निर्धारित मापदंड: स्कूल में पर्याप्त अध्ययन के लिए कक्ष होना जरूरी है। साथ ही छात्र संख्या के हिसाब से कक्ष होना चाहिए, सभी स्कूलों में प्रशिक्षित शिक्षकों का होना अनिवार्य है, सभी स्कूलों में छात्र एवं छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालय होना अनिवार्य है। यदि ऐसा नही है तो उस स्कूल को मान्यता नही मिलेगी, बच्चों को शुद्ध पेयजल की व्यवस्था, खेल मैदान की व्यवस्था, खेल सामग्री,पर्याप्त शैक्षणिक सामग्री, लाइब्रेरी, उच्च कक्षा के लिए प्रयोगशाला अनिवार्य रूप से होना आवश्यक हैं।स्कूल वाहनों में क्षमता से अधिक छात्र बैठाए जाते हैं: प्राइवेट स्कूल वाहनों में छात्रों को क्षमता से अधिक बैठाया जाता है। इन वाहनों में बच्चों को भूसे की तरह भर दिया जाता है।
इस संबंध में छात्राें के अभिभावक स्कूल संचालकों से कई बार शिकायत भी कर चुके हैं। लेकिन व्यवस्था में काेई सुधार नहीं किया गया है। सुविधाएं न होते हुए भी उन्हें शिक्षा संचालन के लिए अनुमति देते जा रहें हैं। इससे पता लगता है कि शिक्षा विभाग के अधिकारी ओर प्रायवेट स्कूलों के संचालक मिल कर शासकीय स्कूलों को बंद करने में तुले हुए हैं।
वहीं शासकीय स्कूलों में अब बच्चों की संख्या भी दिनों दिन कम होता जा रहा है जो कि एक गंभीर चिंता का विषय है शासन प्रशासन द्वारा इस ओर शीघ्र गंभीरता पूर्वक ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में सरकारी स्कूलों में ताला लगने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।