‘इमरजेंसी का दर्द बयां करती मीसाबंदी’ जगदीश लाल उबोवेजा की कहानी उनके पुत्र विपिन की जुबानी।

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विकास नंद/ ब्यूरोचीफ /सर्वव्यापी/

महासमुन्द जिले के सरायपाली नगर के 85 वर्षीय बुजुर्ग मीसाबंदी वरिष्ठ नागरिक जगदीशलाल उबोवेजा को सन् 1975 में आपातकाल के दौरान 18 माह तक बेवजह जेल में गुजारने पड़े थे उस कालखंड के दौरान हुए घटनाक्रम पर जगदीश लाल उबोवेजा के पुत्र विपिन उबोवेजा ने उस विभत्स समय को याद करते हुए सर्वव्यापी से चर्चा में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा अब 25 जून को काला दिवस मनाने का निर्णय का स्वागत योग्य है और राज्य सरकार द्वारा मीसाबंदियों को दी जाने वाली पेंशन योजना के लिए आभार जताया है।

आपको बता दें कि इमरजेंसी के दौरान मीसा कानून के तहत सरकार को यह अधिकार था कि वह किसी भी व्यक्ति को बिना किसी आरोप के, बिना मुकदमा चलाए, अनिश्चित काल तक हिरासत में रख सकती थी. 1975 में, जब इंदिरा गांधी सरकार ने आपातकाल लागू किया, तो इस कानून का व्यापक रूप से विरोधियों और असंतुष्टों को चुप कराने के लिए इस्तेमाल किया गया था. मीसा बंदी (MISA detainees):ऐसे लोग जो मीसा कानून के तहत हिरासत में लिए गए थे, उन्हें “मीसा बंदी” कहा जाता था. मीसा कानून को 1977 में निरस्त कर दिया गया था, लेकिन इसका इतिहास आज भी भारतीय राजनीति और सामाजिक संदर्भ में महत्वपूर्ण है जिस तरह संविधान को ताक में रखकर तात्कालिक सरकार ने आपातकाल लगाने का निर्णय लिया था वह दिन इतिहास में हमेशा के लिए काले दिन के रूप में दर्ज हो गया है और हमेशा इसी तरह एक सुनियोजित हादसे के रूप में याद किया जाता रहेगा।


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