छत्तीसगढ़ी: एक बोली जो अब भी अपनी कुर्सी ढूंढ रही है…

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(रमाकांत एस .मिश्र सरगांव वाले की कलम से)

बोलियों को भाषाओं में तब्दील करने का सपना जितना सरल सुनाई देता है, उसकी राह उतनी ही उलझी होती है। खासकर तब, जब किसी भाषा की रीढ़ संस्कृति हो, धड़कन लोक हो, और आत्मा कोई अनपढ़ किसान… तब उसे दफ़्तरों की फाइलों में समेट पाना वैसा ही है, जैसे नदी को कैनवास में उतारने की कोशिश।छत्तीसगढ़ी… हाँ, वही छत्तीसगढ़ी, जिसे कभी गांव के चौपाल से लेकर लोकगीतों की थाप तक में जिया गया। वही छत्तीसगढ़ी, जो मां की लोरी में लय बनकर उतरती थी और अब शायद केवल मंचों की औपचारिकता तक सिमट गई है।जब छत्तीसगढ़ राज्य बना, तो लगा था कि अब इस बोली को उसका मान मिलेगा, वह कुर्सी मिलेगी जहाँ से वह अपने बच्चों को आवाज़ दे सके – “अब घलो हमन ला सुनव! अब घलो हमर दिन आही!” लेकिन बीते दो दशक इस बोली के लिए कोरे वादों और राजनीतिक हेराफेरी के सूखे कालखंड बन गए।राजभाषा आयोग – सुनने में बड़ा असरदार नाम लगता है। पर इसकी भूमिका वैसी ही हो चली है जैसी किसी शादी में अनुपस्थित ससुर की होती है – नाम तो है, पर न कोई निर्णय, न कोई दिशा। पिछले दो दशकों में आयोग के अध्यक्ष बनते रहे—कभी किसी साहित्य सभा के पुराने चिराग, कभी पद्मश्री सम्मान से अलंकृत नामधारी—but सच कहें तो वे इस भाषा को आगे ले जाने की बजाय पीछे छोड़ते गए। उम्र, अनुभव और सम्मान होने के बावजूद उनमें वह नयी चेतना नहीं थी जिसकी भाषा को ज़रूरत थी।कांग्रेस की सरकार हो या भाजपा की, दोनों ने भाषा के साथ वही किया जो किसी असहाय बूढ़े रिश्तेदार के साथ किया जाता है—”देख लेंगे… समय पर कुछ करेंगे…” और समय कभी आता ही नहीं। पाँच साल तक तो कुर्सी खाली ही रही, और अब भी नतीजा सन्नाटा है।सबसे दिलचस्प बात यह है कि राजभाषा आयोग के संविधान में लिखा है कि अध्यक्ष कोई ऐसा हो जो छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रचार-प्रसार में सक्रिय हो, और पत्रकार या साहित्यकार हो। लेकिन अब तक पत्रकारों को वहां दाख़िल होने की इजाजत तक नहीं मिली। शायद इसलिए कि पत्रकार सवाल पूछते हैं, और यह कुर्सियां जवाब नहीं देना चाहतीं।आज स्थिति यह है कि 45 से ज़्यादा दावेदार लाइन में हैं—हर कोई अपने साथ एक सिफारिश, एक सम्मान और एक उम्र का बोझ लेकर आया है। अधिकांश दावेदार 65 की उम्र पार कर चुके हैं, और कईयों ने तो पिछले दशकों में छत्तीसगढ़ी के लिए उतना ही किया है जितना रेल मंत्रालय ने गांवों के लिए किया है—बस घोषणाएँ।और इन सबके बीच, एक नाम ऐसा भी है जो भीड़ में अलग दिखाई देता है। एक युवा पत्रकार, जिसकी उम्र महज 40 है लेकिन whose shoulders carry more than age—they carry accountability, activism, and actual work. जिसने साइकिल उठाकर छत्तीसगढ़ी के लिए गाँव-गाँव यात्रा की, जिसकी कलम में जनसरोकार है, और जिसकी सोच में आधुनिकता के साथ-साथ परंपरा की जड़ें हैं। लेकिन अफ़सोस, उसकी सबसे बड़ी सिफारिश शायद यही है कि उसके पास कोई राजनीतिक चाचा-भाई नहीं है।इस बार चर्चा में एक और नाम है—रितुराज साहू—जो कथित रूप से केंद्रीय मंत्री और डिप्टी सीएम के रिश्तेदार हैं। राजनीति में रिश्तेदारी कोई अपराध नहीं, लेकिन जब रिश्तेदारी योग्यता से ऊपर आ जाती है, तब लोकतंत्र रोता नहीं, बस मंद मंद मुस्कराता है।तो सवाल यही है—क्या इस बार छत्तीसगढ़ी भाषा के साथ ईमानदारी होगी? क्या इस बार वह युवा आवाज़ सुनी जाएगी जो भाषा को वाकई आगे ले जा सकती है? या फिर ये भी एक और अधूरा सपना बनकर किसी फाइल में धूल खाता रहेगा?छत्तीसगढ़ी को किताबों में नहीं, खेतों में, गलियों में, और अब नीति-निर्माण की मेज़ पर ज़रूरत है। क्योंकि जब तक वह भाषा कुर्सी पर नहीं बैठेगी, तब तक कोई भी बच्चा उसे अपनी ‘पहली भाषा’ मानने की हिम्मत नहीं करेगा।और याद रखिए, कोई भी भाषा तब तक जीवित नहीं मानी जाती जब तक वह सिर्फ पढ़ी नहीं जाती—उसे जिया जाए, गाया जाए, और सबसे अहम—चलाया जाए।अब फैसला छत्तीसगढ़ की सरकार के हाथ में है—वे छत्तीसगढ़ी को जीवित रखना चाहते हैं, या केवल जीवित होने का अभिनय करना चाहते हैं।


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