तरूण कौशिक/ संपादक (सर्वव्यापी)
छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद से बिलासपुर जिले और संभाग की राजनीतिक स्थिति मजबूत रही है। राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री दिवंगत अजीत जोगी यहीं से थे। इसके बाद भाजपा के शासनकाल में बिलासपुर से कई कद्दावर नेता मंत्री, विधानसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष पद तक पहुंचे। डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार में पुन्नूलाल मोहले, अमर अग्रवाल, डॉ. कृष्णमूर्ति बांधी जैसे नेता मंत्री बने। बद्रीधर दीवान विधानसभा उपाध्यक्ष और धरमलाल कौशिक विधानसभा अध्यक्ष बने। वर्तमान में केंद्र में बिलासपुर लोकसभा से सांसद तोखन साहू राज्य मंत्री हैं और अरुण साव, जो मुंगेली मूल के हैं, उपमुख्यमंत्री पद पर विराजमान हैं।इन सभी उपलब्धियों के बावजूद बिलासपुर और इसके पड़ोसी जिलों की मूलभूत समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। क्षेत्र में सड़क और पुल-पुलियों की जर्जर हालत ने विकास के दावों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। मुंगेली मार्ग पर स्थित तखतपुर में वर्षों से जर्जर पुल आज भी बदहाल स्थिति में है, वहीं तखतपुर से मुंगेली सीमा तक के रास्ते पर गड्ढों की भरमार है। चातरखार मोड़ तक की सड़कें भी गड्ढों से पट चुकी हैं, जो बारिश में जलभराव के कारण जानलेवा साबित हो रही हैं।बीते दिनों मस्तूरी विधानसभा क्षेत्र के सीपत-बलौदा मार्ग पर झलमला पुल पर तेज बहाव में एक कार बह गई, जिसमें तीन साल का मासूम बच्चा डूब गया। रतनपुर से केंदा मार्ग तक के पुलों में पानी भरने की घटनाएं आम हो गई हैं। यह सब दर्शाता है कि 25 वर्षों में छत्तीसगढ़ ने भले ही रजत जयंती मना ली हो, लेकिन बुनियादी विकास अब भी अधूरा है।एक ओर क्षेत्र के नेता उच्च पदों पर विराजमान हैं, वहीं दूसरी ओर जनता की समस्याएं अनसुनी रह जाती हैं। हाल ही में तखतपुर में सड़क और पुल निर्माण की मांग को लेकर युवाओं के धरने पर केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू का चर्चा न कर लौट जाना भी जनता में आक्रोश का कारण बना।यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह सब बिलासपुर वासियों के लिए सौभाग्य है या दुर्भाग्य? क्या केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व से विकास संभव है? निश्चित ही अब समय है कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और केंद्र सरकार इस दिशा में गंभीरता दिखाएं। वर्षों पुराने पुलों की ऊंचाई बढ़ाना, जर्जर सड़कों का कायाकल्प करना अब प्राथमिकता होनी चाहिए, वरना यह सौभाग्य भी जनता के लिए अभिशाप बन जाएगा।