श्रीनिवास सुमेर/ सर्वव्यापी/ रायपुर/
अगस्त महीने के पहले सप्ताह में छत्तीसगढ़ की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। एक ओर जहां मंत्रीमंडल विस्तार, संसदीय सचिवों की नियुक्ति और शेष बचे निगम-मंडल-आयोगों में पदस्थापन की चर्चाएं तेज हैं, वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग में अध्यक्ष पद को लेकर सुगबुगाहट शुरू हो गई है।छत्तीसगढ़ी भाषा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से गठित इस आयोग में संभावित नियुक्ति को लेकर राजनीतिक गलियारों में खासी चर्चा है। गौरेला-पेंड्रा-मरवाही से एक वरिष्ठ भाजपा नेता और साहित्यकार का दावा है कि इस बार भी आयोग की कमान किसी उम्रदराज साहित्यकार को ही सौंपी जाएगी। सूत्रों के अनुसार, हाल ही में दिल्ली में केंद्रीय मंत्री तोखन साहू के निवास पर इस मुद्दे पर एक बैठक हुई, जिसमें रायपुर संभाग के 65-70 वर्ष की उम्र के कुछ साहित्यकारों के नामों पर चर्चा की गई। इनमें कुछ ब्राह्मण समाज से, तो कुछ पिछड़ा वर्ग से ताल्लुक रखते हैं।इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के तीन कार्यकालों के दौरान भी इसी उम्र वर्ग के साहित्यकारों को राजभाषा आयोग की कमान सौंपी गई थी। श्यामलाल चतुर्वेदी, दानेश्वर शर्मा और विनय कुमार पाठक जैसे वरिष्ठ साहित्यकारों को अध्यक्ष बनाया गया था — और ये सभी ब्राह्मण समाज से थे। इसके विपरीत कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में इस आयोग को लगभग निष्क्रिय ही रखा गया।भाजपा के सत्ता में लौटने के बाद एक बार फिर यह परंपरा दोहराई जा रही है, जहां युवाओं को दरकिनार कर बुजुर्ग साहित्यकारों को प्राथमिकता दी जा रही है। यह स्थिति तब है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय खुद युवा नेतृत्व को बढ़ावा देने की बात करते हैं।अब देखने वाली बात होगी कि छत्तीसगढ़ी भाषा को राष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए क्या वास्तव में युवा सोच को मौका मिलेगा या फिर यह जिम्मेदारी फिर से वरिष्ठ और अनुभवशील लेकिन उम्रदराज चेहरों को सौंपी जाएगी। निर्णय जो भी हो, यह तय है कि इसकी छाया राज्य की भाषा नीति और सांस्कृतिक पहचान पर ज़रूर पड़ेगी।