तरुण कौशिक/ संपादक – सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की विष्णु देव साय सरकार ने अब तक लगभग 95 प्रतिशत निगम, मंडल, आयोग और बोर्ड में अध्यक्षों की नियुक्ति कर दी है। इन पदाधिकारियों को राज्य, कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया जाता है, साथ ही सरकारी सुविधाएं भी। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन पदाधिकारियों ने सरकार द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारियों को ईमानदारी और सक्रियता से निभाया है?इन संस्थाओं की जिम्मेदारी होती है कि वे न केवल विभागीय कार्यों की निगरानी करें, बल्कि सरकार की योजनाओं को जमीनी स्तर तक प्रभावी ढंग से पहुंचाएं। इसके अलावा, कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाना और जनता के हित में परिणाम देना भी इनकी प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन अब तक किसी भी मुख्यमंत्री द्वारा इन निकायों की नियमित समीक्षा नहीं की गई है, जिससे कई अध्यक्ष अपने हिसाब से काम कर रहे हैं।हाल ही में क्रेडा (छत्तीसगढ़ अक्षय ऊर्जा अभिकरण) के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ भाजपा नेता भूपेंद्र सिंह सवन्नी पर ठेकेदारों ने 3 प्रतिशत कमीशन मांगने का आरोप लगाया था। भले ही इस मामले का बाद में खंडन कर दिया गया हो, लेकिन इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि निगमों और बोर्डों में भ्रष्टाचार की जड़ें कहीं न कहीं मौजूद हैं। ऐसी शिकायतें अक्सर सुनने को मिलती हैं कि कई अध्यक्ष केवल वेतन और सुविधाएं भोगने तक सीमित रह गए हैं और जिम्मेदारी से पूरी तरह विमुख हैं।ऐसे में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को चाहिए कि वे तमाम निगम, मंडल, आयोग और बोर्ड की समीक्षा बैठक लें और यह जानने की कोशिश करें कि क्या उनके अध्यक्ष सरकार की योजनाओं को जन-जन तक पहुंचाने में कोई ठोस भूमिका निभा रहे हैं या नहीं। यदि कोई निष्क्रिय या भ्रष्ट पाया जाता है तो उस पर कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।राज्य के हित और सरकार की छवि को बचाने के लिए यह आवश्यक हो गया है कि इन निकायों को ‘वेतनभोगी आश्रयगृह’ बनने से रोका जाए और उन्हें जनसेवा का मजबूत माध्यम बनाया जाए।