संपादक की कलम से...शिक्षक दिवस – समाज के असली गढ़इहा के सम्मान के दिन। - Sarvavyapi संपादक की कलम से...शिक्षक दिवस – समाज के असली गढ़इहा के सम्मान के दिन। - Sarvavyapi

संपादक की कलम से…शिक्षक दिवस – समाज के असली गढ़इहा के सम्मान के दिन।

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तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/

आज पूरा देश 5 सितम्बर ला शिक्षक दिवस के रूप मं मनावत हावे। ये दिन महान दार्शनिक, विद्वान अउ देश के राष्ट्रपति रहिसन डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जनमदिवस के उपलक्ष्य मं बनाय जाथे। शिक्षक दिवस येकर मायने सिरिफ एक दिन गुरूजी ला फूल-माला पहनाय के नोहय, बल्कि समाज मं उनकर योगदान ला याद करई के अवसर घलो आय।छत्तीसगढ़ के धरती मं गुरू के मान-मरजादा, पूजा अउ आस्था के परंपरा घलो देखे ला मिलथे। “गुरु बिन ज्ञान नई” – ये बात ह हमर लोककथा, गीत, कहिनी मं बखत-बखत गूंजत रहिथे। गुरू सिरिफ किताब मं लिखाय बात ला सिखाय वाले नोहय, बल्कि जिनगी जियाय के सलीका, संस्कार, अउ समाज के प्रति दायित्व निभाय के प्रेरणा घलो देवत हें।आज के बदलत जमाना मं, जब मोबाइल अउ इंटरनेट पढ़ई-लिखई के साधन बन गीस, त शिक्षक के भूमिका अउ बढ़ गीस हे। गुरू अब सिरिफ पाठशाला मं नोहय, घर-घर मं, ऑनलाइन कक्षा मं, अउ समाज के हर कोना मं अपन जिम्मेदारी निभावत हें। हमर गांव-गांव मं, छोटे-छोटे स्कूल मं सेवाभावी गुरूजी मन बिना संसाधन के घलो नवा पीढ़ी के भविष्य गढ़त हें।शिक्षक दिवस ये बात ला घलो याद करवाथे कि गुरूजी मन के मेहनत अउ तपस्या ला समाज ठीक से पहचानय अउ सम्मान देवय। आज जरूरत हे कि हमर सरकार, समाज अउ परिवार मिलके शिक्षा अउ शिक्षक मन के महत्व ला अउ बढ़ावा देवय। गुरूजी मन के प्रेरणा बिना नवा पीढ़ी के सपना अधूरा रह जाही।शिक्षक दिवस के ये सुअवसर मं, सब्बो गुरूजी मन ला हमर नमन, कृतज्ञता अउ अभिनंदन। समाज के गढ़इहा, संस्कार के रचइया अउ ज्ञान के दिपक के रूप मं गुरूजी मन हमर जीवन के असली पथप्रदर्शक हें।


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