तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ का प्रेस क्लब चुनाव अब पत्रकारिता से ज्यादा राजनीति का अड्डा बन चुका है। हालात ऐसे हैं कि जिन पत्रकारों ने सालभर मालिकों और संपादकों से शोषण झेला, उन्हीं के नाम पर चुनाव आते ही दारु पार्टी, बड़े-बड़े वादे और मलाईदार पोस्टों की खरीद–फरोख्त शुरू हो जाती है।शर्म की बात यह है कि कांग्रेस–भाजपा के जनप्रतिनिधियों से लेकर जूता–चप्पल की दुकान चलाने वाले, किराना कारोबारी, पान ठेले वाले, जमीन दलाल तक प्रेस क्लब की सदस्यता सूची में शामिल हो रहे हैं। उल्टा हाल यह है कि वास्तविक और जमीनी स्तर पर दिन–रात मेहनत करने वाले पत्रकारों की कोई पूछ–परख तक नहीं होती।चुनाव के समय बड़े-बड़े मंचों से पत्रकार हित की दुहाई दी जाती है, लेकिन न तो रोजगार की गारंटी मिलती है, न वेतनमान की लड़ाई लड़ी जाती है। बाकी सालभर प्रेस क्लब की गतिविधियाँ ‘मीटिंग, पार्टी और पॉलिटिक्स’ तक सिमटकर रह जाती हैं। पत्रकार बिरादरी के बीच यह सवाल गूंज रहा है कि क्या प्रेस क्लब पत्रकारों की आवाज बनेगा या फिर सियासी ठिकाना और दारू–कबाब का चुनावी अखाड़ा ही बना रहेगा?