तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ भाजपा के भीतर अब खामोशी में उठता असंतोष साफ महसूस किया जा सकता है। एक ओर पार्टी सत्ता में है, पर दूसरी ओर संगठन में वरिष्ठ नेताओं की पूछ-परख न होने से भीतर ही भीतर नाराजगी का लावा धीरे-धीरे उबलने लगा है।पूर्व गृहमंत्री और आदिवासी राजनीति के कद्दावर चेहरा ननकी राम कंवर तक को कलेक्टर हटाने के लिए धरना देना पड़ा, परंतु विडंबना यह कि सत्ता में होते हुए भी वे एक कलेक्टर को नहीं हटा पाए। दूसरी ओर, भाजपा के वरिष्ठ और प्रतिष्ठित नेता, पूर्व राज्यपाल तथा रायपुर के कई बार के सांसद रमेश बैस ने सक्रिय राजनीति में वापसी के लिए पार्टी की सदस्यता तो ले ली, मगर आज उनकी पूछ-परख मानो ‘मिस्ड कॉल’ बनकर रह गई है।भाजपा के ऐसे कई वरिष्ठ चेहरे -पूर्व विधायक, पूर्व सांसद जो संगठन और सरकार दोनों के लिए मार्गदर्शक हो सकते थे, आज हाशिए पर हैं। संगठन और सत्ता की कार्यप्रणाली अब ‘केंद्रीकृत आदेश प्रणाली’ बन गई है, जहां विचार-विमर्श की जगह ‘हाँ में हाँ’ की संस्कृति पनप रही है।यहां तक कि कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी अब दबे सुर में नहीं, खुले मंचों पर सुनाई देने लगी है। पार्टी कार्यालयों में मंत्रियों को हफ्ते में पाँच दिन बैठने और कार्यकर्ताओं से मिलने का निर्देश दिया गया है, मगर कार्यकर्ता कहते हैं, सुनवाई तो अब भी दूर की कौड़ी है!प्रदेश संगठन महामंत्री पवन साय के प्रति भी कार्यकर्ताओं में असंतोष उभर आया है। शिकायत यह है कि फोन उठाना तो दूर, रिसीव टोन तक सुनाई नहीं देती!कुल मिलाकर, भाजपा के भीतर अब वह जोश, वह आत्मीयता और संवाद की संस्कृति गायब होती जा रही है। सत्ता के शोर में संगठन की आत्मा कहीं खो गई है और शायद यही मौन, आने वाले समय में सबसे बड़ा शोर साबित हो सकता है।


