तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ में इन दिनों एक अजीब-सी परिपाटी तेजी से फैल रही है । सत्ता, पद और कुर्सी मिलते ही मोबाइल फ़ोन ‘साइलेंट मोड’ पर चले जाते हैं! भाजपा के कई मंत्री, विधायक, सांसद से लेकर संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारी तक आम कार्यकर्ताओं, वरिष्ठ जनों, यहां तक कि अपने पुराने साथियों के फ़ोन तक नहीं उठा रहे। व्हाट्सएप या सामान्य मैसेज का जवाब देना तो मानो उनके शान के खिलाफ हो गया है।यही रवैया अब प्रशासनिक गलियारों में भी गहराई तक पैठ चुका है। कलेक्टर, जिला पंचायत सीईओ, निगम आयुक्त से लेकर मंत्रालय और संचालनालय के वरिष्ठ अफसरों तक, अधिकांश का हाल एक जैसा है , कॉल करने वाले को घंटों रिंगिंग… सुनाई देती है, लेकिन रिसीव करने वाला कोई नहीं।कई कार्यकर्ताओं और नागरिकों का कहना है कि कोई भी व्यक्ति बिना कारण या बेवजह किसी मंत्री, नेता या अफसर को फ़ोन नहीं करता। किसी की जनसमस्या होती है, तो किसी को योजना से संबंधित जानकारी चाहिए होती है, पर जवाब के नाम पर ‘मौन प्रशासन’ और ‘खामोश नेतृत्व’ मिल रहा है।राजनीतिक गलियारों में अब चर्चा गर्म है कि यह “सत्ता का शुरुर” है या “जनसेवा से दूरी” का नया रूप?क्योंकि वही नेता और अफसर, जो कभी जनता से जुड़े रहने की बातें करते थे, अब उन्हीं जनता के फ़ोन तक उठाना अपनी ‘इमेज’ के खिलाफ समझ रहे हैं।वर्तमान स्थिति पर वरिष्ठ राजनीतिज्ञों का कहना है कि सत्ता का असली चरित्र तब दिखता है जब कुर्सी मिलती है, और छत्तीसगढ़ में आज यही चरित्र साफ दिख रहा है। फ़ोन न उठाना, जवाब न देना ,यह सिर्फ़ अहंकार नहीं, लोकतांत्रिक जवाबदेही से मुंह मोड़ने का प्रतीक है। प्रदेश में यह “मौन सत्ता संस्कृति” धीरे-धीरे विश्वास का संकट बनती जा रही है।जनता अब सवाल पूछ रही है कि क्या यही था वह ‘जनसेवा का संकल्प’ जिसके लिए आपने सत्ता मांगी थी?


