तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
प्रदेश की प्रशासनिक मशीनरी को चुस्त-दुरुस्त करने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने रविवार को मंत्रालय में प्रदेश के सभी कलेक्टरों की मैराथन बैठक ली, जो लगभग 9 घंटे तक चली। इस दौरान मुख्यमंत्री के साथ मुख्य सचिव विकास शील, मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह, अपर मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव और विभागीय सचिव भी मौजूद रहे। बैठक का फोकस था। काम में पारदर्शिता, योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन और जनता से सीधा जुड़ाव।मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने साफ कहा कि प्रदेश में सरकार की नीतियां कागजों पर नहीं, धरातल पर दिखनी चाहिए। जनता को किसी भी स्तर पर परेशानी नहीं होनी चाहिए। वहीं, मुख्य सचिव विकास शील ने कई जिलों में विभागीय समन्वय की कमी और रिपोर्टिंग की लापरवाही पर नाराज़गी जताई।मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कुछ जिलों के कलेक्टर खुद को मुख्यमंत्री समझने लगे हैं। यह प्रवृत्ति अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। प्रशासनिक आदेशों की अवहेलना और वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों को नज़रअंदाज करने वालों पर कड़ी कार्रवाई तय है।सूत्रों के अनुसार, बैठक में कुछ जिलों की सराहना भी की गई, विशेषकर जहाँ सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन जनहित में प्रभावी रहा। लेकिन, कई कलेक्टरों को सीधे तौर पर कामकाज में लापरवाही, आदेशों की अनदेखी और संचार में अभाव के लिए फटकार भी सुननी पड़ी।अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव की सख्त हिदायतों के बाद कलेक्टर अपने जिलों में कितना बदलाव दिखा पाते हैं। यह बैठक न सिर्फ एक चेतावनी थी, बल्कि एक अवसर भी , प्रशासनिक जवाबदेही को नए सिरे से परिभाषित करने का।राज्य की नौकरशाही में व्याप्त आत्मसंतोष और शक्ति के अतिरेक को चुनौती देने वाली यह बैठक भविष्य के लिए एक दिशा तय कर सकती है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि “कलेक्टर राजा” वाली मानसिकता बदलती है या फिर मुख्यमंत्री की चेतावनी महज़ औपचारिक साबित होती है।


