दीपावली पर भी नहीं जले राजनीतिक दीये: संसदीय सचिव पद को लेकर भाजपा में घमासान, विधायक बोले - विष्णु देवता, उपाध्यक्ष ही बना दो! वित्त मंत्री की सख्ती और मुख्यमंत्री की चुप्पी ने बढ़ाया भाजपा का आंतरिक तापमान... पढ़ें पूरी खबर। - Sarvavyapi दीपावली पर भी नहीं जले राजनीतिक दीये: संसदीय सचिव पद को लेकर भाजपा में घमासान, विधायक बोले - विष्णु देवता, उपाध्यक्ष ही बना दो! वित्त मंत्री की सख्ती और मुख्यमंत्री की चुप्पी ने बढ़ाया भाजपा का आंतरिक तापमान... पढ़ें पूरी खबर। - Sarvavyapi

दीपावली पर भी नहीं जले राजनीतिक दीये: संसदीय सचिव पद को लेकर भाजपा में घमासान, विधायक बोले – विष्णु देवता, उपाध्यक्ष ही बना दो! वित्त मंत्री की सख्ती और मुख्यमंत्री की चुप्पी ने बढ़ाया भाजपा का आंतरिक तापमान… पढ़ें पूरी खबर।

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तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ की सियासत इन दिनों आंतरिक खलबली और नाराजगी के दौर से गुजर रही है। भाजपा सरकार की सत्ता में वापसी के बाद यह पहली दीपावली थी, जिससे विधायकों को काफी उम्मीदें थीं। लेकिन त्यौहार के इस अवसर पर जब अपेक्षित ‘सियासी तोहफे’ नहीं बंटे, तब असंतोष खुलकर सामने आने लगा है।

बिलासपुर के एक वरिष्ठ भाजपा विधायक ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि विष्णु देव जी, अब तो मुझे संसदीय सचिव नहीं, सीधा विधानसभा उपाध्यक्ष ही बना दीजिए!

यह बयान न केवल एक विधायक की व्यक्तिगत नाराजगी को दर्शाता है, बल्कि भाजपा के भीतर पनप रहे व्यापक असंतोष की ओर भी इशारा करता है।

सूत्रों के अनुसार, वित्त मंत्री ओमप्रकाश चौधरी ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान में राज्य की आर्थिक स्थिति संसदीय सचिव जैसे पदों को वित्तीय रूप से वहन करने की स्थिति में नहीं है। उनका तर्क है कि अनावश्यक राजनीतिक नियुक्तियों से बचना ही वर्तमान में प्रदेश के हित में है।हालांकि, भाजपा के कई विधायक इसे व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और रणनीतिक राजनीति से जोड़कर देख रहे हैं। एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि वित्तीय अनुशासन की आड़ में नेताओं की महत्वाकांक्षा को कुचला जा रहा है। पार्टी भीतर ही भीतर खदबदा रही है।विधानसभा चुनाव में पार्टी को स्पष्ट बहुमत दिलाने के बाद मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से उम्मीद थी कि वे संगठन और सरकार के बीच संतुलन बनाएंगे। लेकिन कई विधायक उन्हें अब ‘पुतला मुख्यमंत्री’ कहने से भी नहीं हिचक रहे। उनका आरोप है कि साय जी निर्णय लेने की बजाय वित्त मंत्री के पीछे छिपते नजर आ रहे हैं।राजनीतिज्ञों का मानना है कि यदि यह असंतोष जल्द नहीं थमा, तो भाजपा को आने वाले निकाय चुनावों में नुकसान उठाना पड़ सकता है। सरकार बनने के बाद आमतौर पर संसदीय सचिव जैसे पदों के जरिये पार्टी कार्यकर्ताओं और विधायकों को संतुष्ट किया जाता है। लेकिन इस बार यह फार्मूला पूरी तरह खारिज कर दिया गया है।पार्टी के भीतर यह सवाल गूंज रहा है जब अपने ही उपेक्षित रहेंगे तो जनाधार कैसे मजबूत होगा?दीपावली के इस पर्व पर भाजपा के लिए ‘अंधेरा’ ज्यादा और ‘उजाला’ कम दिख रहा है। विधायकों की खुलती नाराजगी, वित्त मंत्री की आर्थिक सख्ती और मुख्यमंत्री की चुप्पी, ये तीनों मिलकर एक ऐसा राजनीतिक तूफान तैयार कर रहे हैं, जो अगर समय रहते नहीं थमा, तो पार्टी को बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है।


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