तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ आज अपने स्थापना के 25 वर्ष पूरे कर चुका है। 1 नवंबर 2000 को मध्यप्रदेश से अलग होकर बने इस राज्य ने विकास की जिस गाथा को लिखा है, वह देशभर में मिसाल बन चुकी है। राज्य जब बना तब मात्र 16 जिले थे, आज यह संख्या बढ़कर 33 जिलों तक पहुंच चुकी है। यह बदलाव केवल भौगोलिक विस्तार का नहीं बल्कि प्रशासनिक और सामाजिक विकास की गहराई का प्रतीक है।राज्य के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने नई राजधानी रायपुर के साथ प्रशासनिक ढांचे की नींव रखी और औद्योगिक दिशा में आगे बढ़ने की शुरुआत की। इस दौर में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को भी सरकारी मंचों पर स्थान मिला। इसके बाद डॉ. रमन सिंह का दौर आया, जिसने स्थायित्व और योजनाबद्ध विकास की दिशा में राज्य को मजबूत किया। बिजली, सड़क, पानी, खाद्य सुरक्षा और जनकल्याण के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई।इसके बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सरकार ने गांवों और किसानों को केंद्र में रखकर योजनाओं का संचालन किया। गोधन न्याय योजना, राजीव गांधी किसान न्याय योजना और महिला सशक्तिकरण से राज्य के ग्रामीण ढांचे को आर्थिक मजबूती मिली। इस दौरान छत्तीसगढ़ी संस्कृति और तीज-त्योहारों को भी सरकारी आयोजनों से जोड़ा गया, जिससे राज्य की अस्मिता को नया जीवन मिला।अब विष्णु देव साय के नेतृत्व में नई सरकार “नया छत्तीसगढ़, नई ऊंचाई” के संकल्प के साथ आगे बढ़ रही है। मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह और मुख्य सचिव विकास शील के कुशल समन्वय में राज्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम जैसी बड़ी राष्ट्रीय तैयारियां सुचारु रूप से संपन्न हो रही हैं। प्रशासनिक दक्षता और सरकार के बीच तालमेल ने छत्तीसगढ़ को देशभर में एक सुशासित राज्य के रूप में स्थापित किया है।परंतु, इन सबके बीच सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जिस भाषा ने इस राज्य को जन्म दिया, उसी को अब तक उसका संवैधानिक हक क्यों नहीं मिला। विकास की रफ्तार तेज हुई, उद्योग बढ़े, जिले बने, लेकिन राज्य की आत्मा कही जाने वाली छत्तीसगढ़ी भाषा अब भी सरकारी फाइलों और भाषणों में सीमित है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि चार सरकारों के बाद भी छत्तीसगढ़ी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया जा सका।भाषाविदों, साहित्यकारों और सामाजिक संगठनों ने बार-बार यह मांग उठाई कि छत्तीसगढ़ी को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिले। उनका कहना है कि जब बोडो, मैथिली, संथाली और डोगरी जैसी भाषाएं संविधान की अनुसूची में शामिल हो सकती हैं, तो करोड़ों लोगों की मातृभाषा छत्तीसगढ़ी क्यों नहीं। यह अब केवल भाषा का नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के स्वाभिमान का विषय बन चुका है।राज्य के 25 वर्ष पूरे होने पर यह स्वीकार करना होगा कि छत्तीसगढ़ ने विकास की कई ऊंचाइयां हासिल की हैं। लेकिन जब तक उसकी भाषा को वह सम्मान नहीं मिलता जो उसकी आत्मा का हिस्सा है, तब तक यह विकास अधूरा रहेगा। छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी राजधानी या सड़कों से नहीं, बल्कि उस भाषा से है जिसमें इस मिट्टी की खुशबू और लोकगीतों की आत्मा बसती है।इसलिए अब वक्त है कि सरकारें केवल विकास की बात न करें, बल्कि भाषा की अस्मिता को भी राष्ट्रीय मंच पर स्थापित करें। क्योंकि राज्य तब पूर्ण होता है, जब उसकी जनता अपनी मातृभाषा में गर्व से बोल सके।


