तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
राजधानी सहित प्रदेशभर में लगातार बढ़ते अपराधों ने एक बार फिर पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नशाखोरी, अवैध शराब बिक्री, चाकू मारी और सट्टा कारोबार जैसी आपराधिक गतिविधियाँ खुलेआम चल रही हैं, लेकिन आरोप यह है कि पुलिस केवल औपचारिक कार्रवाई कर रही है,जिसमें अपराधियों को पकड़कर छोड़ा भी जा रहा है, और कई मामलों में वसूली का खेल भी जारी है।बीते कुछ महीनों में राजधानी रायपुर, भिलाई, बिलासपुर और दुर्ग जैसे प्रमुख शहरों में चाकू मारी और लूट की घटनाएं बढ़ी हैं। अधिकांश मामलों में आरोपी पहचान के निकलते हैं, जिन्हें थाने में पूछताछ के नाम पर बुलाकर समझौता करा दिया जाता है।पुलिस सूत्र बताते हैं कि कई छोटे अपराधी थानों के सूत्रधार बन गए हैं, जो अपराध करते हैं और बाद में वसूली कर मामले को रफा-दफा करवा लेते हैं।प्रदेश में प्रतिबंधित क्षेत्रों में भी खुलेआम अवैध शराब बेची जा रही है। कई बार स्थानीय नागरिकों ने शिकायत की, पर कार्रवाई केवल दिखावे तक सीमित रही। लोगों का कहना है कि पुलिस वसूली के बदले कारोबार को “चलने” देती है। इससे न केवल कानून व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लग रहा है, बल्कि युवाओं का भविष्य भी अंधकार में धकेला जा रहा है।ऐसे हालातों में जनता के बीच पुलिस की साख लगातार गिर रही है। जहां पुलिस भरोसे की प्रतीक होनी चाहिए, वहीं अब आमजन उसे उगाही का माध्यम मानने लगे हैं।सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब तक ऊपरी संरक्षण और थाना वसूली संस्कृति खत्म नहीं होगी, अपराधी तंत्र मजबूत होता रहेगा।पूर्व पुलिस अधिकारी और सामाजिक विश्लेषक मानते हैं कि अपराध रोकने के लिए केवल गिरफ्तारी काफी नहीं, बल्कि ईमानदार जांच और निरंतर निगरानी तंत्र जरूरी है।जब अपराधी यह समझने लगे कि “पैसा देकर छूट” संभव है, तब अपराध का मनोबल स्वतः बढ़ जाता है।अगर पुलिस विभाग अपनी छवि सुधारना चाहता है, तो उसे पहले अपने भीतर झांकना होगा।वसूली की संस्कृति, “कवरअप” कार्रवाई और राजनीतिक दबाव के बीच सच्ची पुलिसिंग कहीं गुम होती जा रही है और जब तक यह नहीं बदलेगा, अपराध कभी नहीं रुकेंगे।


