संपादक के कलम ले...हार ले नई, हार मानने ले डरव! गिरे बिना उड़े नई जा सकय, अब बखत हे युवा मन ला पंख देए के! - Sarvavyapi संपादक के कलम ले...हार ले नई, हार मानने ले डरव! गिरे बिना उड़े नई जा सकय, अब बखत हे युवा मन ला पंख देए के! - Sarvavyapi

संपादक के कलम ले…हार ले नई, हार मानने ले डरव! गिरे बिना उड़े नई जा सकय, अब बखत हे युवा मन ला पंख देए के!

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तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/

समाज मं अब्बड़ गाढ़ सोच बैठ गे हे कि सफ़लता ही सब्बो कुछु होथे, फेर सच्चाई ये हे कि हर बड़ी जीत के जननी हारच होथे। जऊन गिरय ले डरथे, वो कभू उड़े नई सीख पाथे। ये बात सिरिफ आज के युवा बर नई, बल्कि नीति बनइया मन बर घलो एक ठन सच्चा प्रेरणा बन सकथे।आज के युवा हर कोती लड़त हवय — बेरोजगारी ले, अवसर के कमी ले, अउ व्यवस्था के असमानता ले। फेर जदि हार के डर ले कदम पीछू खींच लेही, त ओकर हिम्मत अउ काबिलियत दुनों कुंद हो जाही। जरूरत हे वो सोच के, जऊन कहय — “गिर, फेर उठ जरूर… काबर कि हर गिरावट मं लुके रहिथे नई उड़ान के सुरुवात!”सरकार घलो ये बात ला समझे के जरूरत हे कि सिरिफ रोजगार के आंकड़ा नई, बल्कि युवा मन के आत्मविश्वास बढ़ाय वाला फैसले लेवय। नवाचार, उद्यमिता, स्टार्टअप, अउ कौशल विकास जइसने खेत मं युवा मन ला सिरिफ ट्रेनिंग नई, बल्कि अपन दिशा चुने के आजादी अउ प्रोत्साहन मिलना चाही।काबर कि वो देशच आगू बढ़थे, जिहां के युवा मन गिरके उठे के हिम्मत रखथें।सफलता के असली पहिचान जीते मं नई, बल्कि संघर्ष के कहानी मं होथे।आज जरूरत ये बात के हे कि स्कूल, कॉलेज अउ समाज हर युवा ला ये सिखावय —”हारना अंत नई होथे, वो तो सुरुवात होथे — नवा हौंसला, नवा दिशा अउ नवा उड़ान के!”


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