तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की विष्णु देव साय सरकार के भीतर प्रशासनिक अनुशासन और राजनीतिक नियंत्रण के बीच टकराव अब खुलकर सतह पर आ गया है। सरकार के कार्यकाल के ठीक मध्य में यह सवाल तेज़ी से उठ रहा है कि राज्य की ब्यूरोक्रेसी ‘कलेक्ट्री’ के पुराने अहंकार पर चलेगी या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसे और विज़न के अनुरूप काम करेगी? हालात बताते हैं कि कुछ अधिकारी न सिर्फ सरकार की गति धीमी कर रहे हैं, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा सरकार के लिए संकट भी खड़ा कर रहे हैं।राजनीतिक सूत्रों का दावा है कि एक पूर्व कलेक्टर, जो अपने पद के अभिमान और पुराने रवैये से बाहर नहीं आ पाए हैं, आज सरकार की नैया डुबाने में लगे हुए हैं। विभागीय बैठकों, फील्ड रिपोर्टों और प्रशासनिक क्रियान्वयन में उनकी अनिच्छा और बेरुखी अब सत्ता के गलियारों में चर्चा का विषय बन चुकी है।सियासी विश्लेषकों का कहना है कि यदि प्रशासनिक ढांचे में तुरंत सुधार नहीं हुआ और पूर्व कलेक्टर पर लगाम नहीं कसा गया तो इसका खामियाजा सीधे चुनावी परिणामों में दिखेगा। भाजपा की केंद्रीय नेतृत्व भी राज्य की सुस्त नौकरशाही से नाराज़ बताया जा रहा है, और संकेत स्पष्ट हैं,सरकार अब ‘कलेक्टर्स का शासन’ नहीं बल्कि ‘मोदी के भरोसे का शासन’ चाहती है।ऐसे में सबकी नज़रें अब दो शीर्ष अधिकारियों पर टिकी हैं।मुख्य सचिव विकास शील और मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह। दोनों अफसरों से अपेक्षा है कि वे अपने अनुभव और प्रशासनिक विवेक से समय रहते कठोर फैसले लें, ढर्रे को दुरुस्त करें और ऐसे तत्वों पर कार्रवाई करें जो सरकार की छवि को चोट पहुँचा रहे हैं।राजनीतिक पर्यवेक्षक चेतावनी देते हैं कि यदि अब भी सरकार ने निर्णायक कदम नहीं उठाए, तो 2028 का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए मुश्किल बन सकता है। शासन-प्रशासन की बागडोर समय रहते कसी नहीं गई तो जनता अपनी नाराजगी वोट में उतारने में देर नहीं करेगी। सरकार के लिए यह ‘करो या मरो’ का वक्त है या तो ढर्रा बदलेगा, या परिणाम बदल देंगे जनता।


