तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ के जीवंत समाज ला समझना होए, त एक बात सबले पहिली मन म आथे—इहाँ के मनखे के मया, अपनत्व अऊ सहजपन। बरसों ले अपन सांस्कृतिक धरोहर ला बचाए, अपन बोली-भाखा ला सीने से लगा के रखइया इहाँ के लोगन मन के जीवन-दर्शन आज भी भखरी-भात जइसने साधेसर मोराय म बसे हे। “जेन भखरी-भात खाथे, अइसने छत्तीसगढ़ी मया ला जानथे” ये बात सिरिफ कहावत नई, परचु एक गहिर सत्य हे। जऊन मनखे धरती के सुगंध ला हाथ ले छूथे, आगिया म सिझत भखरी के महक ला महसूस करथे, तेही मन छत्तीसगढ़ के प्रेम, त्याग अऊ परंपरा के असली अर्थ ला समझे सकथे।छत्तीसगढ़ के घर-आंगन म परोसे जइसे साधारण भात-भखरी सिरिफ भोजन नई, परचु संस्कृति के बीज हवंय। इही भोजन सीत ल सेवा अऊ संवेदना के माढ़ा म पाले-बढ़ाए हे। दाऊ- दाई मन प्रतिदिन जऊन थाली सजाथें, तेकर म सिरिफ आनाज नइ, परचु अपन परिवार, अपन समाज अऊ अपन जमीन के प्रति गाढ़ मया भरल रहिथे। भखरी भात के संग जऊन नोन-मिर्चा, सुगंधित हरी भाजी या दाल के कटोरी परोसे जाथे, तेकर म पीढ़ी दर पीढ़ी के संस्कार के गमक सुहावन रूप म दिखथे।छत्तीसगढ़ी मनखे के जीवन गाथा ला समझे बर ये भात-भखरी के दर्शन बहुत जरूरी हे। अइसने मनखे ह भूख ले जियादा अपन परिश्रम के सम्मान म खाथे। खेत म पसीना चुवाके, धान काटके, कोदो-कुटकी म मेहनत ला डालके जऊन अन ले बनथे, तेकर म स्वाभिमान अऊ संतोष के असली स्वाद ये। येही कारण हे कि जेन मन रोज भखरी-भात खाथे, ते मन इहाँ के मया के असली रंग ला जानथे। धन-दौलत के चकाचौंध ले परे, आधुनिकता के चमक-धमक ले दूर, ये अन के संग बसे हे अपनपन, समुदायिक बंधन अऊ छत्तीसगढ़िया गौरव।आज जब दुनिया तेजी ले बदलत हे, शहरिकरण के दौर म भाखा, परंपरा अऊ भोजन संस्कृति के पहिचान धीरे-धीरे धूमिल होत जात हे, ते बखत भखरी-भात जइसने परंपरा अमर संदेश देथे—“जड़ के बिना पेड़ कहाँ?” भलेच आज होटल-रेस्टोरांट के फैशन म आधुनिक व्यंजन मन के बाढ़ आ गे, फेर छत्तीसगढ़ के मनखे बर घर म बने भखरी-भात के स्वाद अभी घलो अपूर, अदभुत अऊ अतूट हे।छत्तीसगढ़िया मनखे ह अपन भाखा ला नई छोड़य, अपन भोजन ला नई त्यागय, अपन मया-अनुराग ला नई बदलय। काबर कि इही सब म वो ह अपन असली पहिचान देखथे। जेन मनखे भखरी-भात खाते हें, ते मन समता, सादगी, श्रम अऊ प्रेम के धरती ला छू के जीयत हें। ये भोजन ह फेर बता देथे कि असली छत्तीसगढ़िया बने बर सोने-चांदी के बरतन नई, परचु धरती के सुगंध ले बने भखरी अऊ अपन लोगन के संग खाय गे भात चाही।जेन भखरी-भात खाथे, अइसने मनखे ह छत्तीसगढ़ी मया ला जानथे, अपन बोली ला मानथे अऊ अपन परंपरा ला आज घलो सीत ले थामे राखे हे।चूंकि भात-भखरी सिरिफ भोजन नई,ते हमर पहिचान, हमर संस्कार, अऊ हमर छत्तीसगढ़िया गर्व के जीवंत प्रतीक हे।


