तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की विष्णु देव साय सरकार इन दिनों एक अनोखे राजनीतिक सांगठनिक संकट से गुजर रही है। कलेक्टरों और अफसरशाही के बढ़ते प्रभाव के बीच अब एक नया मुद्दा प्रशासनिक गलियारों में जोरशोर से चर्चा का विषय बना हुआ है, वह है एक ऐसे व्यक्ति का सत्ता के केंद्र में उभरना, जो पहले आईएएस था और अब विधायक है।सूत्र बताते हैं कि इस ‘पूर्व आईएएस वर्तमान विधायक’ का प्रभाव इस कदर बढ़ गया है कि न सिर्फ जिलों में प्रशासनिक फैसले उनकी मर्जी से प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि मुख्यमंत्री सचिवालय और पूरी भाजपा सरकार किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय पर खुलकर आगे नहीं बढ़ पा रही है।यह स्थिति राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासनिक तंत्र के बीच असंतुलन पैदा कर रही है।अंदरखाने यह चर्चा आम हो चुकी है कि यह विधायक अपनी नौकरशाही पृष्ठभूमि और अफसरों पर पकड़ का ऐसा उपयोग कर रहा है, जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया धीमी हो गई है। कई विभागों में फाइलें आगे नहीं बढ़ पा रही हैं, जबकि जमीनी स्तर पर जनता तेज़ और स्पष्ट निर्णय चाहती है। परिणामस्वरूप सरकार की छवि जनता के बीच मजबूत होने के बजाय दिन-ब-दिन कमजोर पड़ने लगी है।भाजपा के स्थानीय जनप्रतिनिधियों व पार्टी कार्यकर्ताओं को भी यह महसूस होने लगा है कि राजनीतिक नेतृत्व की आवाज दब रही है और प्रशासनिक पक्ष हावी हो रहा है। यही कारण है कि संगठन से लेकर जिलों के नेताओं तक में असंतोष लगातार बढ़ रहा है।राजनीतिक विश्लेषकों का साफ मानना है कि जब एक विधायक अपनी नौकरशाही की पुरानी ताकत के सहारे सरकार की निर्णय-प्रक्रिया को प्रभावित करने लगे, तो राजनीतिक नेतृत्व कमजोर पड़ने लगता है और यही सत्ताविरोधी माहौल की शुरुआत होती है।साय सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह इस स्थिति को नियंत्रित कर सके।यदि यह संतुलन अभी नहीं सुधरा, तो आने वाले समय में भाजपा को जनता के बीच यह जवाब देना मुश्किल होगा कि निर्णय सरकार ले रही है या एक पूर्व आईएएस विधायक की निजी पसंद चल रही है? निर्णयहीनता का यह माहौल भाजपा सरकार के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक जोखिम बन सकता है।


