तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ राज्य को बने 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं। अपनी संस्कृति, पहचान और गौरव की धरोहर कही जाने वाली छत्तीसगढ़ी भाषा को भले ही राजभाषा का दर्जा मिल गया हो, लेकिन सच्चाई यह है कि आज भी सरकारी फाइलों, आदेशों, नोटिसों और दफ्तरों में छत्तीसगढ़ी भाषा का उपयोग लगभग नगण्य है। स्थिति इतनी विडंबनापूर्ण है कि जनप्रतिनिधि भी अपनी मातृभाषा में शपथ तक नहीं ले पा रहे हैं। सवाल यह है—जब सरकार खुद अपनी ही राजभाषा को सम्मान नहीं दे रही, तो यह दर्जा आखिर किस काम का?छत्तीसगढ़ से हर लोकसभा चुनाव में औसतन 9 भाजपा सांसद दिल्ली पहुँचते रहे हैं और आज भी 11 सांसद संसद में मौजूद हैं। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की दिशा में कोई ठोस पहल दिखाई नहीं देती। न संसद में जोरदार मांग, न ही केंद्र पर दबाव—यह चुप्पी अब प्रदेशवासियों के मन में कई सवाल खड़े कर रही है।प्रदेश के 90 विधायक, सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक, वर्षों से आठवीं अनुसूची में शामिल करने की बात करते रहे हैं। प्रस्ताव भी पास हुए, बयान भी आए, लेकिन नतीजा अब तक शून्य। क्या छत्तीसगढ़ी भाषा केवल चुनावी नारों और सांस्कृतिक आयोजनों का हिस्सा बनकर रह गई है?राजभाषा घोषित होने के बाद उम्मीद थी कि सरकार छत्तीसगढ़ी को फाइलों, प्रशासनिक आदेशों, सरकारी वेबसाइटों, ग्राम पंचायत दस्तावेज़ों और शिक्षा प्रणाली में लागू करेगी। परंतु आज भी दफ्तरों में कामकाज हिंदी–अंग्रेज़ी में होता है, जबकि छत्तीसगढ़ी सिर्फ बोलचाल तक सिमटकर रह गई है।भाषा विशेषज्ञों का कहना है कि छत्तीसगढ़ी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल होने से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान, शैक्षणिक मजबूती, और सरकारी संरक्षण मिलेगा। नई पीढ़ी भी भाषा से जुड़ेगी। लेकिन बिना राजनीतिक इच्छाशक्ति यह सपना अधूरा ही रहेगा।अब जनता पूरे हक़ से यह प्रश्न पूछ रही है—जब छत्तीसगढ़ की आत्मा छत्तीसगढ़ी भाषा है, तो हमारे 11 सांसद और 90 विधायक आखिर कब आवाज़ बुलंद करेंगे? मातृभाषा का सम्मान कब मिलेगा? यह मुद्दा अब सिर्फ भाषा का नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की अस्मिता और सम्मान का बन चुका है।


