तरुण कौशिक/ संपादक ,सर्वव्यापी/
भारतीय मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन कल दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र के निधन के बाद जो दृश्य सामने आए, उन्होंने इस स्तंभ की संवेदनशीलता, मर्यादा और ज़िम्मेदारी पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। पत्रकारिता के नाम पर जिस तरह “एक्सक्लूसिव” की भूख में कैमरे पार्थिव शरीर वाले वाहन पर टूट पड़े, वह केवल असंवेदनशीलता नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों का क्षरण है।धर्मेंद्र के अंतिम सफ़र में मीडिया कर्मियों ने जिस हद तक जाकर तस्वीरें और वीडियो लेने की कोशिश की, उसने परिवार को उनके अपने शोक में भी चैन से खड़े रहने नहीं दिया। वाहन को चारों ओर से घेरना, कैमरों को एक-दूसरे के ऊपर चढ़ाकर आगे बढ़ना, यहाँ तक कि परिवार के वाहनों को रोकते हुए फुटेज लेने की प्रतिस्पर्धा—यह सब देखकर मन भीतर तक कचोट उठता है।उस समय धर्मेंद्र की पत्नी हेमा मालिनी, पहली पत्नी प्रकाश कौर, बेटे सनी और बॉबी देओल, बेटी ईशा देओल—ये सब किस मानसिक स्थिति में होंगे, इसका अंदाज़ा लगाने की भी शायद किसी को फुर्सत नहीं थी। उनके दु:ख को समझने के बजाय उसके बीच से “ब्रेकिंग” निकाल लेना ही जैसे कई मीडिया संस्थानों की प्राथमिकता थी।पत्रकारिता का उद्देश्य सदैव जनहित, संवेदनशीलता और सत्य होता है—न कि किसी की निजी वेदना को तमाशा बनाना। कल जो हुआ, वह मीडिया जगत के लिए एक आईना है, जिसमें हमें अपनी गिरती नैतिकता साफ़ दिखाई देती है। अगर हम खुद पर लगाम नहीं लगाएंगे, तो जनता का विश्वास खोना निश्चित है।धर्मेंद्र जैसे महान कलाकार का अंतिम सम्मान भी जब TRP और क्लिक की दौड़ में कुचल दिया जाए, तब यह स्वीकार करना पड़ेगा कि आज के मीडिया को पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है। हमें तय करना होगा कि पत्रकारिता इंसानियत से ऊपर नहीं हो सकती—और न होनी चाहिए।यह समय आत्ममंथन का है। कैमरे की शक्ति बड़ी है, लेकिन उससे बड़ी है मानवता की गरिमा।


