विकास नंद/ सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ की राजनीति में नया साल एक बड़े परिवर्तन की दस्तक लेकर आ सकता है। प्रदेश में भाजपा की विष्णु देव साय सरकार अपने दो वर्ष का कार्यकाल पूरा करने जा रही है, और इसी दौरान मुख्यमंत्री से लेकर कई मंत्रियों तक के बदलाव की अटकलें राजनीतिक गलियारों में आग की तरह फैल चुकी हैं।
सूत्रों की मानें तो हाईकमान सरकार के प्रदर्शन से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है, और तेज गति से निर्णय न होने व जनता के बीच बढ़ती नाराजगी को देखते हुए आने वाले दिनों में बड़ा कदम उठाया जा सकता है।
…दो वर्ष पूरे करने वाली सरकार पर प्रदर्शन का दबाव…
भाजपा की डबल इंजन सरकार ने सत्ता में आते ही सुशासन का वादा किया था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘गारंटी’ के साथ आम जनता में उम्मीदों की बड़ी लहर बनी थी। परंतु दो वर्षों में कई अहम फैसलों में देरी, अधूरे वादों और कार्यान्वयन की सुस्त रफ्तार को लेकर जनता के बीच असंतोष बढ़ता गया और यही असंतोष अब हाईकमान तक पूरी गंभीरता के साथ पहुंच चुका है और इसे लेकर शीर्ष स्तर पर मंथन जारी है।—.
..कैबिनेट में बड़े फेरबदल की आहट – कई मंत्री हो सकते हैं बाहर…
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार पार्टी के कुछ मंत्रियों का प्रदर्शन हाईकमान की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा है। जिन नामों की चर्चा सबसे ज्यादा है,
उनमें—दयालदास बघेल
टंकराम वर्मा
लक्ष्मी रजवाड़े
श्याम बिहारी जायसवाल शामिल हैं।
इन नेताओं के विभागीय कार्यों को लेकर लगातार शिकायतें मिलती रही हैं और इन्हें लेकर पार्टी के भीतर असंतोष भी खुलकर सामने आया है। माना जा रहा है कि इन मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखाकर हाईकमान एक स्पष्ट संदेश देना चाहता है कि ‘‘परफॉर्मेंस ही प्रमोशन का आधार होगा।’’
…पूर्व मंत्रियों और दिग्गज नेताओं की बढ़ती बेचैनी भी कारण…
शासन में अनुभव रखने वाले भाजपा के कई वरिष्ठ नेता लंबे समय से मंत्री पद की दौड़ में हैं। परंतु अवसर न मिलने से उनमें असंतोष बढ़ा है।
सूत्र बताते हैं कि कई कद्दावर नेता एक विस्तृत फेरबदल और नए मंत्रिमंडल गठन की मांग कर रहे हैं, ताकि अनुभव और प्रशासनिक दक्षता वाले नेताओं को अधिक जिम्मेदारी दी जा सके।
राजनीति और ज्योतिष का संबंध पुराना है—और इस बार भी ऐसा ही कुछ चर्चा में है।सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय हाल ही में ओडिशा स्थित महालक्ष्मी मंदिर गये थे, जहाँ वे ज्योतिष और आध्यात्मिक परामर्श के लिए जाने जाने वाले एक ज्योतिषी से मिले। उनके साथ विधायक पुरंदर मिश्रा भी मौजूद थे।बताया जा रहा है कि ज्योतिषीय सलाह में ‘बदलाव की संभावनाओं’ के संकेत मिलने की बात ने रहस्य और बढ़ा दिया है।
हालांकि इस पूरे घटनाक्रम की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम हो चुकी है कि मुख्यमंत्री ने यह यात्रा अचानक और विशेष कारणों से की थी।यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि पिछली भूपेश बघेल सरकार में भी जब मुख्यमंत्री बदलने की अटकलें जोरों पर थीं, तब तत्कालीन मुख्यमंत्री भी ज्योतिषीय सलाह लेने पहुंचे थे। उसी तरह की समान घटनाओं को अब राजनीतिक विश्लेषक ‘परिवर्तन की पूर्व सूचना’ के रूप में देख रहे हैं।
भाजपा और मोदी सरकार की कार्य शैली कठिन फ़ैसलों के लिए जानी जाती हैं
भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी की पहचान त्वरित व कड़े फैसले लेने वाली नेतृत्व शैली के रूप में है।राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वास्तव में मुख्यमंत्री परिवर्तन या बड़े स्तर पर मंत्रिमंडल फेरबदल होता है, तो यह—संगठनात्मक मजबूती,प्रशासनिक सुधार,और 2028 के विधानसभा चुनाव के लिए रणनीतिक तैयारी का संकेत होगा।इसके साथ ही पार्टी यह संदेश भी देना चाहेगी कि “सरकार पद का नहीं, प्रदर्शन का खेल है।”
…जनता के बीच बढ़ती नाराजगी भी बड़ा मुद्दा…
ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरी मतदाताओं तक, जनता में बढ़ती नाराजगी को नजरअंदाज करना पार्टी के लिए जोखिम भरा हो सकता है। कुछ प्रमुख योजनाओं में धीमी प्रगति, महंगाई, बेरोजगारी और स्थानीय मुद्दों को लेकर जनता की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं।हाईकमान इन संकेतों को आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले गंभीरता से ले रहा है।…
फ़िलहाल राजनीति में चुप्पी, पर संकेत स्पष्ट…
दूसरी तरफ अभी तक भाजपा की ओर से किसी भी संभावित बदलाव पर आधिकारिक बयान नहीं दिया गया है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय भी इस मामले में पूरी तरह चुप्पी साधे हुए हैं। मगर राजनीतिक घटनाओं की तेज़ रफ्तार और लगातार उभरती चर्चाओं से यह साफ है कि कुछ न कुछ बड़ा पक रहा है।
राज्य की राजनीति पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि— 2026 छत्तीसगढ़ की राजनीति के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।”मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों तक, बड़ा बदलाव होना है या नहीं—यह कुछ दिनों में साफ हो जाएगा। परंतु इतना तय है कि छत्तीसगढ़ की राजनीति इन दिनों बेहद रोमांचक दौर से गुजर रही है और हर कदम पर नए समीकरण बनते-बिगड़ते नजर आ रहे हैं।
बहरहाल अब सबकी निगाहें दिल्ली के हाईकमान पर टिकी हैं, जो आने वाले वर्ष में प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करेगा।


