तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार 13 दिसंबर को दो वर्ष पूरा करने जा रही है, लेकिन प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में एक सवाल जोर पकड़ चुका है—क्या सरकार राजनीतिक नियुक्तियों की फाइलों पर लगी नींद आखिर कब खोलेगी? दो साल पूरे हो गए, पर संसदीय सचिवों से लेकर निगम–मंडल तक कई अहम कुर्सियाँ अभी भी बिना मालिक की पड़ी धूल फांक रही हैं।पहली बार निर्वाचित हुए विधायक महीनों से उम्मीद की खिड़की पर नजरें गड़ाए बैठे हैं, मगर ‘निर्णय’ नाम की चिड़िया उड़कर अभी तक मंत्रिमंडल परिसर में नहीं उतरी है। वरिष्ठ विधायक तो खैर खुद जानते हैं कि उन्हें संसदीय सचिव बनने का मौका नहीं मिलता, लेकिन नए चेहरे अब संगठनात्मक संतुलन की राह तकते-तकते थकने लगे हैं।*राजभाषा आयोग—राजभाषा तो बनी, लेकिन आयोग का पता आज तक गुम!*छत्तीसगढ़ी भाषा को रमन सिंह सरकार के समय राजभाषा का दर्जा जरूर मिला, पर आयोग का गठन मानो किसी ‘अनसुलझे रहस्य’ की फाइल बन गया है। कांग्रेस सरकार के पांच साल और भाजपा सरकार के दो साल… कुल सात साल में भी न अध्यक्ष बने, न सदस्य!राजपत्र में साफ है कि यहां साहित्यकारों, पत्रकारों और भाषा के जानकारों की नियुक्ति होनी चाहिए—लेकिन फिलहाल आयोग की कुर्सियाँ ऐसे खाली हैं जैसे कोई पुराने सरकारी भवन की टूटी खिड़कियाँ। न भाषा का प्रचार हो पा रहा, न सरकार संवेदनशील दिख रही—बस फाइलें ही संवेदनशीलता का बोझ उठाए घूम रही हैं।*निगम–मंडल–आयोग–बोर्ड: कुर्सियाँ खाली, कार्यकर्ता निराश; सरकार ‘विचार’ में व्यस्त*प्रदेश के तमाम निगम–मंडल–आयोग–बोर्ड में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य पदों पर ‘सन्नाटा’ पसरा है।कोऑपरेटिव बैंकों में संचालक मंडलों का गठन लंबे समय से फंसा है।नगरीय प्रशासन में एल्डरमैनों की नियुक्ति भी ‘अगली बैठक में’ के भरोसे अटकी हुई है।ये ऐसे पद हैं जो राजनीतिक कार्यकर्ताओं के मनोबल और संगठन की ऊर्जा दोनों को बढ़ाते हैं, पर देरी ने हर कार्यकर्ता के अंदर एक ही सवाल जगा दिया है—हमारा नंबर आखिर कब आएगा?*भाजपा संगठन को दिखानी होगी सक्रियता—वरना नाराज़गी बढ़ती जाएगी*प्रदेश भाजपा अध्यक्ष किरण सिंह देव और संगठन महामंत्री पवन साय को अब इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री से गम्भीर व खुली बातचीत करनी होगी। राजनीतिक नियुक्तियों का एकमुश्त पैकेज ही वह मरहम बन सकता है, जो कार्यकर्ताओं के दुखते मन पर तत्काल असर दिखाएगा।*साय सरकार का तीसरा साल—अब संगठनात्मक ‘नींद’ से बाहर निकलने का समय*सरकार जब दो वर्ष का कार्यकाल पूरा कर रही है, तब जनता के मुद्दों के साथ-साथ संगठनात्मक संतुलन भी शासन का जरूरी हिस्सा है।अब सरकार को संसदीय सचिवों की नियुक्ति,निगम–मंडल–आयोग–बोर्ड की रिक्तियां भरना,कोऑपरेटिव बैंक संचालक मंडलों का गठनपर तुरंत और निर्णायक फैसला लेना चाहिए।राजनीति में कुर्सियाँ खाली रहना उतना ही खतरनाक है जितना शासन में शून्य संवाद—दोनों ही स्थिति संगठन और सरकार की छवि को कमजोर करती हैं। अब समय है कि साय सरकार फाइलों की धूल झाड़कर राजनीतिक नियुक्तियों पर ठोस कदम उठाए और कार्यकर्ताओं को यह भरोसा दे कि उनकी मेहनत और निष्ठा का सम्मान होना तय है।


