विकास नंद/ सर्वव्यापी/
सरायपाली विधानसभा क्षेत्र में डीएम फंड से खरीदे गए पानी टैंकरों की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। ग्राम पंचायतों को वित्तीय वर्ष 2024-25 में विकास कार्यों हेतु डीएम फंड की राशि आवंटित की गई थी, लेकिन स्थानीय जनप्रतिनिधियों के हस्तक्षेप ने पूरे सिस्टम पर नई बहस छेड़ दी है।
ग्राम पंचायतें आरोप लगा रही हैं कि उन्हें महज “कार्य एजेंसी” बनाकर रखा गया है, जबकि वास्तविक निर्माण कार्य, सामग्री चयन और संपूर्ण आय-व्यय की कमान जनप्रतिनिधियों द्वारा अपने पसंदीदा ठेकेदारों को सौंप दी गई है। इससे पंचायत प्रतिनिधियों में नाराज़गी खुलकर सामने आने लगी है।हमारी टीम ने इस मामले में कई ग्राम पंचायतों के सरपंचों से चर्चा की।
उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि—>
“हमें संवैधानिक रूप से 20 लाख रुपए तक के कार्यों के लिए स्वतंत्र अधिकार प्राप्त हैं, लेकिन यहां तो पूरी प्रक्रिया जनप्रतिनिधि संचालित कर रहे हैं। हमसे सिर्फ कागज़ों पर हस्ताक्षर करा लिए जाते हैं, बाकी कार्य ठेकेदारों के माध्यम से किया जा रहा है। यह ग्राम पंचायतों के अधिकारों पर सीधा अतिक्रमण है।”सरपंचों ने पानी टैंकरों की गुणवत्ता को लेकर भी असंतोष जताया। उन्होंने कहा कि वितरित किए गए कई टैंकर निम्न गुणवत्ता के हैं, जिनकी टिकाऊ क्षमता और निर्माण स्तर गंभीर सवालों के घेरे में है।इसके साथ ही सबसे चिंताजनक बात यह रही कि शासन द्वारा दी जाने वाली 15वीं वित्त आयोग की राशि अभी तक ग्राम पंचायतों को प्राप्त नहीं हो पाई है, जिससे ग्राम पंचायतों को साफ–सफाई, बिजली बिल, पेयजल, नाली निर्माण एवं अन्य मूलभूत सेवाओं में भारी आर्थिक संकट से जूझना पड़ रहा है।
सरपंचों का कहना है कि—> “विकास कार्यों की जिम्मेदारी हमारी है, लेकिन धन और निर्णय दोनों जनप्रतिनिधियों के अधीन कर दिए गए हैं।
पंचायतें बिना फंड और बिना अधिकार के कैसे विकास करें?”
पिछली सरकार के समय के भ्रष्टाचार की गूंज अभी भी जारी गौरतलब है कि पिछली सरकार में डीएम फंड में हुए भ्रष्टाचार और बंदरबांट को लेकर लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं। वर्तमान सरकार को बने दो वर्ष होने के बाद भी कई अनियमितताओं की परतें अभी तक खुल रही हैं। ऐसे में सरायपाली विधानसभा में सामने आई यह पूरी प्रक्रिया एक बार फिर भ्रष्टाचार और अपारदर्शिता के संदेह को गहरा कर रही है।
स्थानीय लोगों और पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि डीएम फंड जैसी महत्वपूर्ण राशि का उपयोग पारदर्शिता और ग्राम पंचायतों के अधिकारों के अनुरूप किया जाना चाहिए, न कि राजनीतिक हस्तक्षेप और मनमाने ठेकेदारों के माध्यम से।
यदि स्थिति नहीं सुधरी तो यह मामला ग्रामीणों और पंचायत प्रतिनिधियों के बीच और अधिक असंतोष को जन्म दे सकता है।


