तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ के बदलत समाजिक तस्वीर मं एक सवाल बार-बार उभरत हावय—आखिर वृद्धाश्रम के जरूरत काबर बढ़त जावत हावे? जेन दऊत-मइका अपन पूरा जिनगी अपन लइका मन बर खपा दितिन, जेन मन अपन भूख-प्यास भुलाकर लइका ला पढ़ाइन-लिखाइन, बड़ा करिन, समाज मं सम्मान दिलाइन, आज ऊही माता-पिता लइका के घर मं बोझ बनत जावत हें। नानकुर ले कोसा खवईय्या माता-पिता के लिए आज के कतको लइका मन के दिल मं अपन जगह घटत जावत हावे।जिन माता-पिता अपन लइका मन बर रात-रात भर जागिन, बीमारी-मर्ज मं पहरेदारी करिन, अपन सपना भुलाके लइका के सपना पूरा करिन, नौकरी-पदोन्नति ले लेकर घर-गांव सब छोड़के अपन जिनगी लइका के नाम लिख दितिन, ऊही लइका मन आज शादी के बाद, बहू के कहे ले, या समाजिक दबाव मं, या धन-दौलत के नशा मं, माता-पिता ला अलग कर देत हें। धीरे-धीरे संस्कार के जगह दिखावा ले ले लेथें, और अपन बूढ़ा दऊत-मइका संग बिताय जाय के कुछ मिनट ला भारी समझे लगथें।वृद्धाश्रम एक बखत ओ मन बर बने ठौर रहिस जेकर कोनो नइ रहिस। पर आज हालत ये हावय कि जिनके लइका जिन्दा हें, धन-दौलत वाले हें, उही मन अपन माता-पिता ला वृद्धाश्रम भेज देथें। बहाना बन जाथे—“समय नई मिलत”, “तबियत बेरा-बेरा बिगड़थे”, “बहू ला तकलीफ होथे”, “बच्चा मन पढ़त हें”, “नोकरी भारी हवय”… पर का एक बात भूल जाय हें—जेन मन आज सेवा करे बर ‘समय’ नइ निकाल पा रहिन, वो माता-पिता एक बखत दिन-रात सम्हार देथें, बिना कोनो बहाना देय।घर के आराम छोड़के वृद्धाश्रम मं रहना माता-पिता बर केतका पीड़ादायक होथे, ये बात शायद लइका मन समझे के कोशिश घलो नई करथें। जेन घर मं उनकर हंसी-ठिठोली गूंजत रहिस, उही घर ले निकलके वो आज अंजोर लइका के सुख खातिर अंधियारी कोठरी मं जबरदस्ती भेजे जात हें।अब सवाल सरकार ले घलो उठत हावे—काबर कड़ा कानून नइ बनत? देश मं भरण-पोषण कानून त बनिस हावय, पर ओकर पालन लइका मन करे नई चाहथें। माता-पिता के त्याग के बदला मं आज अधिकार घलो नई मिलत। छत्तीसगढ़ सरकार ले अपेक्षा हावय कि जेन लइका मन अपन माता-पिता के देखभाल झन करंय, वो मन ऊपर भारी दंड, जेल, और सामाजिक कार्रवाई होवय। माता-पिता के त्याग ला त्यागने वाले मनखे बर कड़ा प्रावधान जरूरी हावय, काबर कि संस्कृति और संवेदना बिना कानून के कड़ाई झन बन सकय।छत्तीसगढ़ के धरोहर हमेशा दऊत-मइका के सम्मान रहिस। गांव-देहात मं आजो लोग कहिथें—दऊत-मइका घर के बरकत हें। पर जउन घर मं माता-पिता के जगह टीवी, मोबाइल, अउ दिखावा ले भर गे, ओ घर मं सुख-चैन कइसे आए?वृद्धाश्रम त मजबूरी मं बने, पर माता-पिता ला घर ले निकाल देना इंसानियत के हार हावय। दऊत-मइका के दुआ जउन घर मं रहिथे, वो घर मं भगवान बसे रहिथे। धन-दौलत, पद-प्रतिष्ठा, दुनियादारी सब मिलही, पर माता-पिता के दुआ खो देहू, त जिनगी अधूरा रह जाथे।इही बखत जरूरत ये हावय कि समाज अपन सोच बदले, लइका मन अपन जिम्मेदारी समझें, सरकार कड़ाई ले कानून लागू करे, और हर मनखे अपन दऊत-मइका ला अपन घर मं सम्मान देवय। काबर बिना दऊत के आशीर्वाद, कोई घर, कोई धन, कोई प्रतिष्ठा सच मानी मं सार्थक नई होवय।


