तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
बिलासपुर संभाग में जब भी कुर्मी समाज की स्थिति, एकजुटता और भविष्य को लेकर गंभीर चिंतन की बात आती है, तो प्रशासनिक सेवा में रहते हुए भी समाजहित में खुलकर बोलने वाले एक ही नाम पर चर्चा सिमट जाती है—बी.आर. वर्मा। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अंतर्गत जनपद पंचायत में मुख्य कार्यपालन अधिकारी के रूप में पदस्थ बी.आर. वर्मा न केवल एक संवेदनशील अधिकारी हैं, बल्कि कुर्मी समाज की जमीनी हकीकत को बिना लाग-लपेट सामने रखने वाले दुर्लभ व्यक्तित्व भी हैं।कुर्मी समाज के लोगों का कहना है कि मूल रूप से रायपुर जिले के निवासी बी.आर. वर्मा अब पूरी तरह से बिलासपुर के होकर रह गए हैं। वे अन्य संगठित समाजों की तर्ज पर कुर्मी समाज को भी हर स्तर पर एकजुट रखने, समाज के गरीब और वंचित वर्ग को प्रशासनिक, राजनीतिक, व्यवसायिक और कृषि क्षेत्रों में आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर लगातार जोर देते रहे हैं।बी.आर. वर्मा खुले मंचों और सामाजिक बैठकों में यह सवाल उठाते रहे हैं कि छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक संख्या होने के बावजूद कुर्मी समाज आज भी अपेक्षित प्रभाव से क्यों वंचित है। उनके अनुसार इसकी सबसे बड़ी वजह समाज के कुछ वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं की संकीर्ण सोच है, जो अपने ही समाज के होनहार युवाओं, उभरते नेताओं और प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ने का अवसर नहीं दे रहे हैं।बिलासपुर जिला इसका प्रत्यक्ष उदाहरण बनकर सामने आता है, जहां प्रशासन, राजनीति, व्यवसाय और अन्य प्रभावशाली क्षेत्रों में कुर्मी समाज की मौजूदगी अपेक्षाकृत कमजोर दिखाई देती है। समाज के भीतर व्याप्त गुटबाजी, आपसी मतभेद और आज भी मौजूद फिरकापरस्ती को इसकी प्रमुख वजह माना जा रहा है।सामाजिक जानकारों का मानना है कि यदि कुर्मी समाज के राजनीतिक नेता ईमानदारी से पहल करें, तो न केवल बिलासपुर जिले में बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में कुर्मी समाज का दबदबा स्थापित हो सकता है। लेकिन दुर्भाग्यवश इस दिशा में कोई ठोस और संगठित प्रयास नहीं किए जा रहे हैं।बी.आर. वर्मा जैसे अधिकारी और सामाजिक चिंतक इस सच्चाई को बेझिझक सामने रखते हैं। शायद यही कारण है कि समाजहित की बात करने वाले ऐसे कई लोग आज भी उपेक्षा के शिकार हैं। सवाल यह है कि क्या कुर्मी समाज समय रहते आत्ममंथन करेगा, या फिर संख्या में आगे होकर भी प्रभाव में पीछे रहने की यह स्थिति यूं ही बनी रहेगी?