तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/

बिलासपुर जिले की बिल्हा विधानसभा सीट एक बार फिर छत्तीसगढ़ की सियासत का हॉटस्पॉट बनती नजर आ रही है। छत्तीसगढ़ विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ भाजपा नेता धरमलाल कौशिक के निर्वाचन क्षेत्र में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर भीतरखाने तेज राजनीतिक हलचल शुरू हो चुकी है। टिकट को लेकर न केवल दावेदार बढ़ रहे हैं, बल्कि पार्टी की रणनीति, नेतृत्व की सोच और “परिवारवाद बनाम प्रदर्शन” की बहस भी खुलकर सामने आने लगी है।सूत्रों के मुताबिक, विधायक धरमलाल कौशिक खुद चुनाव लड़ने के बजाय इस बार अपने पुत्र देवेंद्र कौशिक को भाजपा प्रत्याशी बनाने के लिए अभी से संगठन और शीर्ष नेतृत्व तक अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे हुए हैं। इसे राजनीतिक उत्तराधिकार के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, पार्टी के भीतर ही इस रणनीति को लेकर असहजता भी साफ दिखाई देने लगी है।इसी बीच क्रेडा अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह सवन्नी का नाम भी बिल्हा सीट से संभावित भाजपा प्रत्याशी के रूप में चर्चा में है। संगठनात्मक अनुभव, प्रशासनिक पकड़ और ऊर्जा क्षेत्र में उनकी सक्रिय भूमिका को देखते हुए समर्थक उन्हें “सुरक्षित और स्वीकार्य विकल्प” के रूप में पेश कर रहे हैं।सबसे बड़ा राजनीतिक वजन हालांकि उप मुख्यमंत्री अरुण साव के नाम को लेकर महसूस किया जा रहा है। साव का बिल्हा क्षेत्र में सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव, संगठन पर उनकी पकड़ और प्रदेश स्तर पर मजबूत छवि उन्हें इस सीट का सबसे ताकतवर दावेदार बनाती है। यदि भाजपा नेतृत्व इस सीट को हाई-प्रोफाइल बनाना चाहता है, तो अरुण साव का नाम सबसे ऊपर माना जा रहा है।इधर, भाजपा के भीतर यह भी चर्चा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में परिवारवाद के खिलाफ स्पष्ट रुख को देखते हुए टिकट वितरण में वंशवाद को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी। ऐसे में देवेंद्र कौशिक की दावेदारी पार्टी की घोषित नीति के विपरीत मानी जा रही है, जो धरमलाल कौशिक की रणनीति के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है।राजनीतिक समीकरण को और दिलचस्प बना रही हैं अंबालिका साहू, जो कांग्रेस का दामन छोड़कर भाजपा में शामिल हो चुकी हैं। साहू की जमीनी पकड़, महिला वोट बैंक और हालिया राजनीतिक सक्रियता ने उन्हें भी टिकट की दौड़ में मजबूत दावेदार बना दिया है। पार्टी यदि सामाजिक संतुलन और नए चेहरे पर दांव लगाती है, तो अंबालिका साहू का नाम चौंकाने वाला फैसला हो सकता है।कुल मिलाकर, बिल्हा विधानसभा सीट अब केवल एक स्थानीय चुनावी मैदान नहीं रह गई है, बल्कि यह भाजपा की आंतरिक राजनीति, नेतृत्व की प्राथमिकताओं और मोदी युग की चुनावी सोच की परीक्षा बनती जा रही है। यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी अनुभव और विरासत को तरजीह देती है या फिर प्रदर्शन, संगठन और नए राजनीतिक समीकरणों के आधार पर बड़ा फैसला लेती है।बिल्हा की सियासत में फिलहाल एक ही सवाल गूंज रहा है -टिकट किसे? विरासत को, नेतृत्व को या नए सियासी प्रयोग को?