तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बार-बार न्याय में एकरूपता (Consistency) की आवश्यकता पर जोर दिए जाने के बावजूद लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े मामलों में जिला न्यायालयों, उच्च न्यायालयों और पुलिस प्रशासन के रुख में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध को स्वतः बलात्कार या दैहिक शोषण नहीं माना जा सकता, इसके बावजूद पुलिस द्वारा ऐसे मामलों में गंभीर आपराधिक धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की जा रही है।सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे युवक-युवती के बीच सहमति से बने संबंध को केवल “शादी का झांसा” बताकर बलात्कार की श्रेणी में रखना हर मामले में उचित नहीं है। न्यायालयों ने यह भी कहा है कि ऐसे मामलों में परिस्थितियों, संबंध की अवधि और दोनों पक्षों की मंशा की गहन जांच आवश्यक है। इसके बाद भी जमीनी स्तर पर पुलिस प्रशासन अक्सर बिना प्रारंभिक परीक्षण के बलात्कार और दैहिक शोषण जैसी धाराओं में मामला दर्ज कर लेता है।अग्रिम जमानत पर सख्तीकानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े मामलों में अग्रिम जमानत को लेकर भी अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाया जा रहा है। कई मामलों में अदालतें अग्रिम जमानत देने से इनकार कर देती हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सहमति से लंबे समय तक चले संबंधों को अपराध मानने से पहले सावधानी जरूरी है।छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का हालिया मामलाछत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में हाल ही में सामने आए एक मामले ने इस बहस को और तेज कर दिया है। मामले में एक महिला ने अपने शादीशुदा प्रेमी के साथ करीब 12 वर्षों तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के बाद उस पर शादी का झांसा देकर बलात्कार करने का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराई। आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट और अन्य उच्च न्यायालयों के आदेशों का हवाला देते हुए एफआईआर निरस्त करने की याचिका दायर की थी, लेकिन उच्च न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी। फिलहाल यह मामला जिला न्यायालय में लंबित है।इसी प्रकरण में महिला ने बाद में कुटुंब न्यायालय में परिवाद दायर कर संबंधित पुरुष से हर माह खर्च-पानी (भरण-पोषण) की मांग भी की है। इस स्थिति ने कानून विशेषज्ञों और समाज में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।उठ रहे हैं गंभीर सवालकानूनी जानकारों का कहना है कि एक ही संबंध को एक ओर बलात्कार का आधार और दूसरी ओर भरण-पोषण का आधार बनाना न्यायिक दृष्टि से विरोधाभास पैदा करता है। यदि संबंध सहमति से था तो आपराधिक धाराएं क्यों, और यदि अपराध था तो दीर्घकालिक सहजीवन और आर्थिक दावे कैसे—यह सवाल अब न्यायिक विमर्श का केंद्र बनता जा रहा है।दिशा-निर्देशों की जरूरत-विशेषज्ञों का मानना है कि लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप स्पष्ट और बाध्यकारी दिशा-निर्देश बनाए जाने की आवश्यकता है, ताकि पुलिस, निचली अदालतें और उच्च न्यायालय एक समान दृष्टिकोण अपनाएं और न्यायिक भ्रम की स्थिति समाप्त हो सके।