जंगल में विकास का दावा, भीतर ही भीतर भ्रष्टाचार का एक्सप्रेस-वे…मरवाही वन मंडल योजनाओं की आड़ में उठते गंभीर सवाल।

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तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/

एक ओर सरकार जंगलों के संरक्षण, विकास और आदिवासी अंचलों के समग्र उत्थान के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर मरवाही वन मंडल से जुड़ा मामला इन दावों की सच्चाई पर गहरे प्रश्नचिह्न खड़े करता नजर आ रहा है। कागजों में विकास की चमक-दमक है, लेकिन जमीनी हकीकत में भ्रष्टाचार का ऐसा एक्सप्रेस-वे बनता दिख रहा है, जिस पर बिना रोक-टोक सरकारी धन दौड़ाया जा रहा है।विभागीय सूत्रों के अनुसार मरवाही वन मंडल में बीते वर्षों में वन विकास, सड़क निर्माण, पौधरोपण, संरचना निर्माण और अन्य मदों में भारी राशि स्वीकृत की गई। फाइलों में कार्य पूर्ण दर्शाए गए, भुगतान भी निर्बाध रूप से जारी हो गया, लेकिन जब इन कार्यों की वास्तविक स्थिति देखने की बात आती है, तो तस्वीर बिल्कुल उलट नजर आती है। कहीं अधूरी सड़कें हैं, कहीं बिना उपयोग की संरचनाएं, तो कहीं कार्य का नामोनिशान तक नहीं।विभागीय सूत्रों बताते हैं कि दस्तावेजों में मरवाही वन मंडल को विकास की मिसाल बताया जा रहा है। रिपोर्टों में जंगलों के संरक्षण, रोजगार सृजन और आधारभूत सुविधाओं के विस्तार का उल्लेख है। मगर विभागीय सूत्रों का कहना है कि न तो उन्हें अपेक्षित रोजगार मिला और न ही घोषित कार्यों का लाभ। कई स्थानों पर जंगल के नाम पर स्वीकृत राशि का उपयोग कथित तौर पर नियमों को ताक पर रखकर किया गया।सूत्र बताते हैं कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि कार्य सही ढंग से हुए हैं, तो उनके भौतिक सत्यापन से डर क्यों? क्यों निरीक्षण रिपोर्टों और भुगतान आदेशों में तिथियों, कार्य विवरण और स्थल की स्थिति को लेकर विरोधाभास दिखाई दे रहे हैं? जानकारों का मानना है कि यदि निष्पक्ष जांच हो, तो कई फाइलें खुद-ब-खुद सच्चाई बयान कर देंगी।और कई पूर्व डीएफओ की नौकरी चली जाएगी और जेल जाना पड़ जाएगा। विभाग के कुछ ईमानदार कर्मचारियों का कहना है कि मरवाही वन मंडल में कराए गए विकास कार्यों की उच्चस्तरीय, स्वतंत्र जांच की मांग की है। उनका कहना है कि जंगल और आदिवासी अंचल विकास के नाम पर यदि भ्रष्टाचार को खुली छूट दी गई, तो इसका सीधा नुकसान पर्यावरण, स्थानीय जनता और सरकारी भरोसेतीनों को होगा।वहीं वर्तमान डीएफओ ग्रीष्मी चांद जहां एक ओर भ्रष्टाचार को मिटाने की हिम्मत जुटा रहे हैं तो धीरे धीरे उन पर भी कुछ आरोप लगाए जा रहे हैं और उनके ही अधिनस्थ रेंजरों द्वारा डीएफओ ग्रीष्मी चांद को फंसाने की रणनीति भी तैयार की जा रही है। ऐसे में डीएफओ को सोच समझकर काम काज निपटाने की आवश्यकता है।अब देखना यह है कि प्रशासन इस “विकास बनाम भ्रष्टाचार” के सवाल पर चुप्पी साधे रखता है या फिर सच को सामने लाने के लिए ठोस कदम उठाता है। क्योंकि यदि जंगल में विकास के नाम पर भ्रष्टाचार का एक्सप्रेस-वे यूं ही चलता रहा, तो इसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ेगी। वहीं सर्वव्यापी अपने आगामी अंकों में वन विभाग मरवाही में सड़क घोटाले की विस्तृत खबर प्रकाशित करने जा रही है।


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