2003–2008 की शिक्षक भर्ती में महाघोटाला! निष्पक्ष जांच हुई तो 95% शिक्षक जाएंगे घर, कई पहुंचेंगे सलाखों के पीछे… पढ़ें पूरी खबर।

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तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर संभाग में वर्ष 2003 से 2008 के बीच जनपद पंचायत एवं जिला पंचायत के अधीन हुई शिक्षा कर्मियों की भर्ती आज एक बार फिर बड़े सवालों के घेरे में है। उस दौर की भर्तियों को लेकर गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं कि चयन प्रक्रिया में भारी पैमाने पर फर्जीवाड़ा, नियमों की खुलेआम अनदेखी और प्रभावशाली लोगों के दबाव में नियुक्तियां की गईं।सूत्रों और शिकायतकर्ताओं का दावा है कि मेरिट सूची में बड़े पैमाने पर हेरफेर हुआ, अयोग्य अभ्यर्थियों को योग्य दिखाकर नियुक्ति दी गई और कई मामलों में शिक्षक नेताओं एवं तत्कालीन रसूखदारों के रिश्तेदारों को नियम ताक पर रखकर नौकरी थमा दी गई। हैरानी की बात यह है कि इन नियुक्तियों के खिलाफ समय-समय पर शिकायतें भी हुईं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल कागजी जांच बैठा दी गई, नतीजा शून्य ही रहा।अब सवाल सीधे-सीधे वर्तमान सरकार और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर खड़ा हो गया है। जानकारों का कहना है कि यदि 2003 से 2008 के बीच हुई शिक्षा कर्मी भर्तियों की निष्पक्ष, पारदर्शी और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, तो 95 प्रतिशत तक शिक्षकों की नौकरी जाना तय है। इतना ही नहीं, यदि दस्तावेजी फर्जीवाड़ा, जालसाजी और आपराधिक षड्यंत्र की धाराओं में कार्रवाई हुई, तो कई तथाकथित शिक्षक और उनके संरक्षक सलाखों के पीछे भी पहुंच सकते हैं।यह भी आरोप है कि जांच को हर बार राजनीतिक और संगठनात्मक दबाव में कमजोर कर दिया गया। जिन मामलों में सख्त कार्रवाई होनी चाहिए थी, वहां फाइलें दबा दी गईं या जांच को वर्षों तक लटकाकर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। इससे न केवल योग्य अभ्यर्थियों के साथ अन्याय हुआ, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी गहरा आघात पहुंचा।बिलासपुर संभाग में यह मुद्दा अब फिर से तूल पकड़ रहा है। आम जनता और बेरोजगार युवाओं में यह सवाल गूंज रहा है कि क्या सरकार सच में शिक्षा व्यवस्था को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहती है, या फिर पुराने घोटालों पर पर्दा डालकर आगे बढ़ जाना ही उसकी नीति है।अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय इस चुनौती को स्वीकार करते हुए 2003–2008 की शिक्षा कर्मी भर्तियों की निष्पक्ष जांच के आदेश देते हैं या फिर यह मामला भी “जांच जारी है” की फाइलों में दबकर रह जाएगा। यदि सरकार ने ईमानदारी से कदम उठाया, तो यह छत्तीसगढ़ की राजनीति और शिक्षा व्यवस्था में अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई साबित हो सकती है।


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