जंगल के रखवाले ही बने माफिया! सागौन घोटाले का पर्दाफाश, डीएफओ -रेंजर तक फंसा मामला।

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तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ राज्य के बालोद जिले में वन संरक्षण की जिम्मेदारी संभालने वाले वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारियों का एक बेहद चौंकाने वाला और शर्मनाक चेहरा सामने आया है। जिनके कंधों पर जंगलों की सुरक्षा का दायित्व था, वही अधिकारी अब “वनों के भक्षक” बनते नजर आ रहे हैं। बेसकीमती सागौन के पेड़ों की अवैध कटाई कराकर उनसे अपने लिए फर्नीचर तैयार करवाने का सनसनीखेज मामला उजागर हुआ है।इस पूरे प्रकरण की शिकायत एक स्थानीय व्यक्ति द्वारा की गई, जिसके बाद विभागीय गलियारों में हड़कंप मच गया। शिकायतकर्ता का आरोप है कि जंगल से अवैध रूप से काटी गई सागौन की लकड़ी से टी-टेबल, ड्रेसिंग टेबल सहित अन्य महंगे फर्नीचर बनवाए गए। इस अवैध गतिविधि में तत्कालीन वनमंडल अधिकारी, रेंजर, डिप्टी रेंजर समेत कई अधिकारियों की संलिप्तता सामने आ रही है।सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि अवैध रूप से काटी गई सागौन की लकड़ी को चोरी-छिपे बाहर ले जाने के बजाय उसे वन विभाग के ही सुरक्षित काष्ठागार में लाया गया। यहीं से नियमों को ताक पर रखकर लकड़ी को आरा-मिल में चिरवाया गया और फिर कारपेंटर तक पहुंचाया गया, जहां उससे फर्नीचर तैयार किया गया।मामले की गंभीरता को देखते हुए रायपुर से विशेष टीम बालोद पहुंची और कार्रवाई करते हुए काष्ठागार में रखी सागौन की लकड़ी तथा कारपेंटर के यहां से तैयार चिरान को जब्त कर लिया। जांच के दौरान यह भी सामने आया है कि तत्कालीन वनमंडल अधिकारी अभिषेक अग्रवाल के निर्देश पर डौंडी रेंजर जीवन लाल भोंडेकर को आदेश दिए गए, जिसके बाद पूरे अवैध खेल को योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया।विभागीय सूत्रों ने बताया कि, डौंडी परिक्षेत्र के बीटेझर बिट से कीमती सागौन की लकड़ी भेजी गई थी। अधिकारियों को खुश करने के लिए उड़नदस्ता की सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल किया गया और बिट गार्ड ईश्वर साहू के माध्यम से लकड़ी रवाना की गई।अब यह मामला केवल अवैध कटाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसमें सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग, विभागीय संरक्षण और उच्च अधिकारियों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जांच आगे बढ़ने के साथ-साथ वन विभाग के भीतर बड़े खुलासों की आशंका जताई जा रही है।


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