तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
देश म आज भ्रष्टाचार एक चर्चा के विषय नइ रहि गे हे, बल्कि आम जनता के रोजमर्रा के जिंदगी के हिस्सा बन गे हे। केंद्र सरकार “भ्रष्टाचार मुक्त भारत” के नारा देथे, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंच ले बड़े-बड़े बात कहिथें, फेर जब आम आदमी जमीन म उतर के हकीकत देखथे, त ये नारा खोखला लगय लगथे। जनता के मन म सवाल उठत हे—का सच म व्यवस्था बदले के इच्छाशक्ति हे, या फेर सब कुछ सिरिफ भाषण अऊ प्रचार तक सीमित हे?न्यायपालिका जऊन लोकतंत्र के सबसे मजबूत खंभा माने जाथे, उहां ले आथे शिकायत के आवाज। पेशी बढ़ाय बर, तारीख आगे सरकाय बर, अऊ कागजी प्रक्रिया म राहत पाय बर रिश्वत लेय जावत हे—ये बात अब कानाफूसी नइ, खुले चर्चा बन गे हे। गरीब, कमजोर अऊ साधनहीन आदमी न्याय पाय बर सालों कोर्ट के चक्कर काटत रहिथे। ओकर फाइल धूल खाथे, तारीख ऊपर तारीख पड़थे, अऊ उंहा बैठे दलाल अऊ बिचौलिया अपन खेल खेलत रहिथें। जऊन पैसा दे सकथे, ओकर रास्ता आसान हो जाथे, अऊ जऊन नइ दे सके, वो टूट जाथे।सरकारी दफ्तर मन के हालत भी कुछ अलग नइ हे। आज बिना चापलूसी, बिना “खर्चा-पानी” के काम होय के उम्मीद रखना मुश्किल हो गे हे। फाइल एक टेबल ले दूसर टेबल म महीना-महीना घूमत रहिथे। ईमानदार कर्मचारी अऊ आम नागरिक लाइन म खड़ा रहिथें, अऊ जी-हुजूरी करे वाला अऊ पहचान वाला सीधे केबिन म घुस जाथे। ये सिस्टम मेहनत अऊ ईमानदारी के बजाय सिफारिश अऊ रिश्वत के इनाम देथे।छत्तीसगढ़ होवय या देश के अउ कोनो हिस्सा, हालात लगभग एक जइसनेच हे। छोटे कर्मचारी मन ऊपर कार्रवाई देखाय जाथे, फेर बड़े अफसर अऊ बड़े घोटालेबाज मन तक हाथ पहुंचत नइ दिखे। जब तक ऊपर ले नीचे तक सख्त कार्रवाई नइ होही, तब तक भ्रष्टाचार के जड़ हिलई नइ। जनता इही पूछत हे—का सरकार के मंशा सिरिफ छोटे मछरी पकड़े के हे, या बड़े मछरी मन ऊपर भी जाल डाले जाही?प्रधानमंत्री “ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा” के बात कहिथें, फेर जब हर सरकारी दफ्तर म घूसखोरी के शिकायत आम हो गे हे, त भरोसा डगमगात हे। लोगन मन ये मानय लगें हें कि दमदार बयान देना आसान हे, फेर व्यवस्था सुधारना कठिन।