विकास नंद/ सर्वव्यापी/
रायपुर साहित्य महोत्सव के तीसरे एवं समापन दिवस पर ‘पत्रकारिता और साहित्य’ विषय पर एक विचारोत्तेजक पैनल चर्चा का आयोजन किया गया। लाला जगदलपुरी मंडप में आयोजित यह सत्र दिवंगत वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय बबन प्रसाद मिश्र की स्मृति को समर्पित रहा। पैनल चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार स्मिता मिश्र, डॉ. हिमांशु द्विवेदी, अवधेश कुमार और गिरीश पंकज शामिल हुए, जबकि सत्र का संचालन विभाष झा ने किया।चर्चा के दौरान वरिष्ठ पत्रकार गिरीश पंकज ने कहा कि पत्रकारिता हो या साहित्य, दोनों का मूल उद्देश्य जनहित और सामाजिक उत्तरदायित्व होना चाहिए। ‘हरिभूमि’ के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने पत्रकारिता में निष्पक्षता और संवेदनशीलता को अनिवार्य बताते हुए कहा कि साहित्य तथ्यों और परिस्थितियों पर गहन चिंतन के माध्यम से व्यापक दृष्टि प्रदान करता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पत्रकार संस्थागत मर्यादाओं में कार्य करता है, जबकि साहित्यकार को विषय की अभिव्यक्ति में अधिक स्वतंत्रता प्राप्त होती है।वरिष्ठ पत्रकार स्मिता मिश्र ने कहा कि पत्रकारिता और साहित्य के बीच अंतर शैली, भाषा और दृष्टिकोण का है। पत्रकारिता तथ्यप्रधान होती है, जबकि साहित्य भावनाओं और संवेदनाओं को अधिक स्थान देता है। उन्होंने दोनों ही क्षेत्रों में भाषा की संवेदनशीलता और सहानुभूति को आवश्यक बताया।अपने अनुभव साझा करते हुए श्री अवधेश कुमार ने पत्रकारिता और साहित्य को एक ही सिक्के के दो पहलू बताते हुए कहा कि पत्रकारिता के अनुभव अक्सर साहित्यिक सृजन की प्रेरणा बनते हैं।सत्र के दौरान संचालक विभाष झा ने छत्तीसगढ़ के प्रख्यात पत्रकारों मुक्तिबोध और माधवराव सप्रे के योगदान को स्मरण करते हुए सामाजिक चेतना के विस्तार में साहित्य की भूमिका पर प्रकाश डाला। पैनल में समकालीन पत्रकारिता में सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव और उससे उत्पन्न चुनौतियों पर भी चर्चा की गई।इस अवसर पर स्मृति दुबे के कविता संग्रह ‘करुण प्रकाश’ तथा लोकनाथ साहू ललकार के कविता संग्रह ‘यह बांसुरी की नहीं बेला है’ का विमोचन भी अतिथियों के करकमलों से सम्पन्न हुआ।