तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग की वर्ष 2003 की मुख्य परीक्षा में कथित फर्जी तरीकों और संगठित साजिश के जरिए हुई नियुक्तियों का मामला एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। जिस चयन प्रक्रिया को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने अनियमितताओं से ग्रस्त मानते हुए कई अधिकारियों को अयोग्य ठहराया था, वही अधिकारी आज सत्ता और प्रशासन के सबसे प्रभावशाली पद कलेक्टर की कुर्सी पर बैठे हुए हैं। न्यायालय की टिप्पणियों और पूरे प्रकरण के न्यायिक दायरे में होने के बावजूद इन अधिकारियों का न केवल सेवा में बने रहना, बल्कि महत्वपूर्ण जिलों की जिम्मेदारी संभालना, शासन-प्रशासन की मंशा पर सवालिया निशान खड़े करता है। विभागीय सूत्रों के अनुसार सीजी पीएससी 2003 चयन से आए कुछ अधिकारी कलेक्टर पद पर बैठकर स्वयं को मुख्यमंत्री से कम नहीं समझ रहे हैं। प्रशासनिक फैसलों में निरंकुशता, जनप्रतिनिधियों की अनदेखी और नियमों की खुलेआम अवहेलना जैसे आरोप लगातार सामने आ रहे हैं, लेकिन सत्ता के संरक्षण में इन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही। यही नहीं, इसी विवादित चयन प्रक्रिया से आए कुछ अन्य अधिकारी आज भी कलेक्टर बनने की प्रतीक्षा में कतारबद्ध हैं, मानो पूरा घोटाला एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया हो।पूरा मामला अब सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है, जहां वर्षों से अंतिम सुनवाई का इंतजार किया जा रहा है। प्रदेश की जनता, ईमानदार अधिकारी और चयन प्रक्रिया में बाहर रह गए योग्य अभ्यर्थी यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर इतने गंभीर प्रकरण में अब तक अंतिम निर्णय क्यों नहीं हो पाया। यदि चयन प्रक्रिया ही अवैध और संदिग्ध थी, तो उसके आधार पर वर्षों से लिए गए प्रशासनिक फैसलों की वैधानिकता क्या है और उनकी जिम्मेदारी कौन लेगा।सीजी पीएसस 2003 घोटाला अब केवल भर्ती की अनियमितता का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक नैतिकता, न्यायिक प्रभावशीलता और लोकतांत्रिक व्यवस्था की साख का प्रश्न बन चुका है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर प्रदेश की निगाहें टिकी हैं, क्योंकि यही फैसला तय करेगा कि कानून वास्तव में सर्वोच्च है या फिर सत्ता की कुर्सी पर बैठते ही अयोग्यता भी योग्यता में बदल जाती है।