तरुण कौशिक/ संपादक, सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार के दो साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन अब तक संसदीय सचिवों की नियुक्ति नहीं हो पाना सत्ता के गलियारों में बड़े सवाल खड़े कर रहा है। जबकि संसदीय सचिवों की नियुक्ति मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार माना जाता है, इसके बावजूद यह निर्णय लगातार टलता जा रहा है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि इसके पीछे सरकार की अंदरूनी खींचतान और सत्ता संतुलन की राजनीति काम कर रही है।सरकार के भीतर सबसे बड़ा कारण वित्त मंत्री ओमप्रकाश चौधरी की आपत्ति को माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि वित्त मंत्री का तर्क है कि संसदीय सचिवों की नियुक्ति से शासन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। वित्तीय अनुशासन के नाम पर यह दलील जरूर दी जा रही है, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या सिर्फ़ पैसों का ही मामला है, या फिर इसके पीछे विधायकों को अतिरिक्त अधिकार और प्रभाव मिलने का डर भी छिपा है।इस फैसले का सीधा असर सत्ताधारी दल के विधायकों पर पड़ता दिख रहा है। पार्टी के कई विधायक, जिन्होंने चुनाव के दौरान सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई, आज खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। संसदीय सचिव पद को वे सरकार में भागीदारी और सम्मान का प्रतीक मानते हैं। नियुक्ति न होने से विधायकों में अपने ही सरकार के प्रति भीतर ही भीतर आक्रोश पनप रहा है, जो फिलहाल दबा हुआ है, लेकिन समय के साथ खुलकर सामने आ सकता है।सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि मुख्यमंत्री ने दो-दो वरिष्ठ पत्रकारों को अपना सलाहकार नियुक्त किया है, जिनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे सरकार और जनप्रतिनिधियों के बीच सेतु का काम करेंगे। इसके बावजूद संसदीय सचिवों की नियुक्ति जैसे संवेदनशील मुद्दे पर न मुख्यमंत्री की ओर से कोई ठोस संकेत सामने आया है और न ही सलाहकारों की कोई सार्वजनिक भूमिका दिखाई दे रही है। यह चुप्पी अब खुद एक राजनीतिक संदेश बनती जा रही है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसदीय सचिवों की नियुक्ति केवल पद वितरण का विषय नहीं, बल्कि सरकार के भीतर संतुलन बनाए रखने का जरिया भी होती है। यदि इस मुद्दे को लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया, तो यह असंतोष संगठनात्मक कमजोरी में बदल सकता है, जिसका असर भविष्य की राजनीति पर भी पड़ सकता है।अब सवाल साफ है कि, क्या मुख्यमंत्री अपने विशेषाधिकार का उपयोग कर इस सियासी असमंजस को खत्म करेंगे, या फिर वित्त मंत्री की ‘आर्थिक आपत्ति’ के आगे सरकार की राजनीतिक मजबूरियां यूं ही खामोश बनी रहेंगी? राजनीतिक गलियारों में इस सवाल की गूंज तेज़ होती जा रही है।