तरुण कौशिक/ संपादक, सर्वव्यापी/
बिलासपुर शिक्षा विभाग के जिला कार्यालय का हाल इन दिनों बेहद चिंताजनक है। एक साथ तीन-तीन खंड का प्रभार संभालने वाले बाबू पर गंभीर शिकायत के बाद उन्हें हटाया गया, लेकिन किसी अन्य बाबू ने यह प्रभार लेने की हिम्मत नहीं दिखाई। नतीजतन, कार्यालय में कामकाज पूरी तरह ठप्प हो गया है।जिला शिक्षा अधिकारी विजय टान्डे कार्यालय को नियमित समय नहीं दे रहे हैं। कर्मचारी और आगंतुक घंटों इंतजार करते रहते हैं। कार्यालय की फाइलें अटकी हुई हैं और प्रशासनिक प्रक्रिया चरमरा गई है।कंप्यूटर टेबल पर बैठे शख्स को देखकर कोई भी भ्रमित हो सकता है। यह कोई बाबू नहीं, बल्कि एक भृत्य (चपरासी/प्यून) है। जो सामान्यतः फाइल लाने-ले जाने, सफाई और चौकीदारी करता था, उसे अब जिला शिक्षा अधिकारी के आदेश पर स्थापना शाखा के सहयोगी के रूप में कंप्यूटर पर बैठाया गया है।कर्मचारी दबी जुबान में कहते हैं, जिला शिक्षा अधिकारी विजय टान्डे के राज में चपरासी बना बाबू, और गोपनीय फाइलें कंप्यूटर पर चल रही हैं।पूर्व में पदस्थ बाबू सुनील यादव पर गंभीर शिकायत के बाद उन्हें हटाया गया। तब से न्यायालयीन, स्थापना-4, मेडिकल और अनुकंपा नियुक्ति खंड अनाथ हो गए हैं। कोई भी कर्मचारी इन खंडों का प्रभार लेने को तैयार नहीं है।सूत्र बताते हैं कि इन खंडों को ‘मनहूस खंड’ कहा जा रहा है। प्रभार लेने के बाद यदि फाइलें उपलब्ध नहीं हुईं, तो जिम्मेदारों की परेशानी और बढ़ सकती है।विभागीय सूत्रों ने बताया कि डीईओ का ‘विशेष’ आदेश है कि भृत्य को कंप्यूटर ऑपरेटर बनाकर कार्यालय में तैनात करना, कर्मचारियों और आगंतुकों के लिए हैरानी का विषय बना है। चर्चा यह है कि बिलासपुर में बाबुओं की कमी नहीं, बल्कि ‘खास पसंद’ मायने रखती है।सूचना के अधिकार के तहत दर्ज मामलों की सुनवाई लटकी हुई है। उच्च शिक्षित कर्मचारियों की उपेक्षा और भृत्य की ‘खास पसंद’ तैनाती ने कार्यालय की विश्वसनीयता और गोपनीयता दोनों पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है।आगंतुक, कर्मचारी और सूत्र यही पूछ रहे हैं कि क्या बिलासपुर शिक्षा विभाग अब जंगल राज बन गया है? जिला शिक्षा अधिकारी के नेतृत्व में भ्रष्टाचार, मनमानी और उदासीनता ने कार्यालय को सार्वजनिक निरीक्षण का केंद्र बना दिया है। अगर राजधानी में बैठे जिम्मेदार अधिकारी संज्ञान नहीं लेते, तो विभाग की यह लचर व्यवस्था और बदनाम होती जाएगी।