तरुण कौशिक/ संपादक, सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की राजभाषा छत्तीसगढ़ी आज अपने ही प्रदेश के सरकारी स्कूलों में उपेक्षा की शिकार है। प्राथमिक कक्षाओं में छत्तीसगढ़ी भाषा की पढ़ाई-लिखाई को लेकर शिक्षक वर्ग रुचि नहीं दिखा रहा है, नतीजतन कक्षा पहली से पांचवीं तक बच्चों को उनकी मातृभाषा से दूर किया जा रहा है। यह स्थिति तब है जब पूर्ववर्ती रमन सिंह सरकार के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ी भाषा को दो-चार पाठ्यक्रम के रूप में पहली से पांचवीं कक्षा तक विधिवत पाठ्यक्रम में शामिल किया गया था।नीति और काग़ज़ों में शामिल छत्तीसगढ़ी भाषा ज़मीनी स्तर पर गायब है। अधिकांश सरकारी प्राथमिक स्कूलों में न तो छत्तीसगढ़ी की नियमित कक्षाएं लग रही हैं और न ही बच्चों को इस भाषा में पढ़ने-लिखने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। शिक्षकों की घोर लापरवाही और निगरानी के अभाव में राजभाषा केवल फाइलों तक सीमित होकर रह गई है।सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि शिक्षा विभाग के आला अधिकारी इस स्थिति से अनजान बने हुए हैं। शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव से लेकर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय तक की ओर से अब तक कोई ठोस निर्देश या सख्त पहल सामने नहीं आई है। राजभाषा के संरक्षण और संवर्धन की बातें मंचों पर तो होती हैं, लेकिन स्कूलों की कक्षाओं में छत्तीसगढ़ी का नामोनिशान तक नहीं दिखता।भाषा विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि प्राथमिक स्तर पर बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा नहीं दी गई, तो आने वाली पीढ़ी छत्तीसगढ़ी भाषा से कटती चली जाएगी। राजभाषा का दर्जा केवल नाम का रह जाएगा और सांस्कृतिक पहचान को गहरा आघात पहुंचेगा।अब सवाल यह है कि क्या सरकार और शिक्षा विभाग नींद से जागेंगे? क्या शिक्षकों की जवाबदेही तय होगी? या फिर छत्तीसगढ़ की राजभाषा सरकारी स्कूलों में यूं ही उपेक्षा की शिकार बनी रहेगी। यह मुद्दा केवल भाषा का नहीं, बल्कि प्रदेश की पहचान और भविष्य से जुड़ा है।