तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में कुलपति की नियुक्ति को लेकर एक बार फिर सियासी भूचाल मचता दिख रहा है। कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार के कार्यकाल में हुई इस नियुक्ति को लेकर उस समय गंभीर सवाल उठे थे और तत्कालीन राज्यपाल अनुसुईया उईके भी घेरे में आई थीं। नियुक्ति की प्रक्रिया, पात्रता और नियमों के उल्लंघन को लेकर विपक्ष ने इसे “फर्जी नियुक्ति” बताते हुए भ्रष्टाचार का मामला करार दिया था।लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद हालात बदल गए हैं। भाजपा की विष्णु देव साय सरकार, जो चुनाव से पहले फर्जी नियुक्तियों और भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के बड़े-बड़े दावे करती रही, अब उसी विवादित नियुक्ति पर खामोश नजर आ रही है। न तो जांच के आदेश, न ही किसी तरह की सार्वजनिक सफाई—सरकार की यह चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है।राजनितिज्ञों का कहना है कि यदि नियुक्ति में वास्तव में नियमों का उल्लंघन हुआ था, तो नई सरकार के पास उसे सुधारने और दोषियों पर कार्रवाई करने का सुनहरा मौका था। इसके बावजूद अब तक कोई ठोस कदम न उठना भाजपा के भ्रष्टाचार-विरोधी नैरेटिव को कमजोर करता है। वहीं विपक्ष का आरोप है कि सत्ता में आते ही भाजपा का रवैया बदल गया और जिन मुद्दों पर वह कल तक हमलावर थी, आज उन्हीं पर मौन साध लिया गया है।विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान में कुलपति की नियुक्ति केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि अकादमिक साख से जुड़ा विषय है। ऐसे में इस मामले पर स्पष्टता और पारदर्शिता की मांग तेज हो रही है। सवाल साफ है, क्या भाजपा सरकार अपने ही दावों पर खरी उतरेगी, या यह विवाद भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?