ईमानदारी की सज़ा?मरवाही वन मंडल अधिकारी ग्रीष्मी चांद को बदनाम करने की साज़िश, विभागीय भ्रष्टाचारियों में खलबली।

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तरुण कौशिक,संपादक/ सर्वव्यापी

मरवाही वन मंडल में इन दिनों एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ IFS अधिकारी को सुनियोजित तरीके से बदनाम करने की कोशिशों ने प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है। मरवाही की वन मंडल अधिकारी ग्रीष्मी चांद, जो अपनी सख्त कार्यशैली और भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस के लिए जानी जाती हैं, उन्हीं के विभाग के कुछ लोगों द्वारा भ्रष्टाचार के झूठे आरोपों में घसीटी जा रही हैं।सूत्रों के अनुसार, ग्रीष्मी चांद ने पदभार संभालने के बाद अवैध कटाई, फर्जी भुगतान, कागजी कार्यों में हेराफेरी और वर्षों से जमे भ्रष्ट तंत्र पर सख्त कार्रवाई शुरू की थी। इसी सख्ती से असहज हुए कुछ कर्मचारियों और अधिकारियों ने उनके खिलाफ अफवाहें फैलाने और उच्च स्तर पर गलत सूचनाएं पहुंचाने का रास्ता अपनाया।बताया जा रहा है कि जिन मामलों में पहले आंख मूंदकर भुगतान होते रहे, उन पर ग्रीष्मी चांद ने न केवल आपत्ति दर्ज की बल्कि दस्तावेजों की गहन जांच भी कराई। इससे विभाग के भीतर बैठे कुछ प्रभावशाली लोग कटघरे में आ गए। अब वही लोग अपनी गर्दन बचाने के लिए ईमानदार अधिकारी की छवि धूमिल करने में जुटे हुए हैं।स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम है कि ग्रीष्मी चांद के खिलाफ लगाए जा रहे आरोपों के पीछे कोई ठोस प्रमाण नहीं है, बल्कि यह सब उनकी निष्पक्ष और निर्भीक कार्यशैली का परिणाम है। वन विभाग से जुड़े जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते इन साज़िशों की निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो इससे न केवल एक ईमानदार अधिकारी का मनोबल टूटेगा बल्कि भ्रष्टाचारियों के हौसले भी बुलंद होंगे। प्रशासनिक गलियारों में यह मांग तेज हो रही है कि पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय और स्वतंत्र जांच कराई जाए, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। साथ ही यह भी आवश्यक है कि ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों को संरक्षण मिले, न कि उन्हें ही कटघरे में खड़ा किया जाए।मरवाही वन मंडल का यह मामला अब सिर्फ एक अधिकारी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल बन गया है कि क्या सिस्टम ईमानदार अफसरों के साथ खड़ा होगा या फिर विभागीय साज़िशें एक बार फिर जीत जाएंगी।


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