कबीरधाम /धनंजय साहू/ब्यूरो चीफ, सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग की निष्पक्षता और सामाजिक संतुलन को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। आयोग के अध्यक्ष पद पर एक बार फिर ब्राह्मण समाज से आने वाले प्रभात मिश्रा की नियुक्ति ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह आयोग वास्तव में सर्व समाज की भाषाई भागीदारी का प्रतिनिधित्व करता है या फिर यह पद विशेष समाज के लिए ही आरक्षित बनकर रह गया है।यदि पिछले अध्यक्षों पर नजर डाली जाए तो स्थिति और भी स्पष्ट होती है।राज्य गठन के बाद सर्वप्रथम श्याम लाल चतुर्वेदी, दूसरी बार दानेश्वर शर्मा, तीसरी बार विनय पाठक और अब पुनः प्रभात मिश्रा—चारों ही अध्यक्ष ब्राह्मण समाज से रहे हैं। लगातार चार कार्यकालों में एक ही समाज से नियुक्तियां होने के बाद राजभाषा आयोग को लेकर सामाजिक संगठनों और प्रबुद्ध वर्गों में असंतोष उभरने लगा है।आलोचकों का कहना है कि छत्तीसगढ़ जैसे बहु-सांस्कृतिक और बहुभाषी राज्य में राजभाषा आयोग जैसे संवैधानिक महत्व के निकाय में अन्य समाजों, वर्गों और भाषाई विशेषज्ञों को अवसर न मिलना गंभीर चिंता का विषय है। खासकर जब छत्तीसगढ़ी, हल्बी, गोंडी, सरगुजिया सहित अनेक लोकभाषाओं के संरक्षण और संवर्धन की जिम्मेदारी इस आयोग पर है।सामाजिक संगठनों का सवाल है किक्या राजभाषा आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी है?क्या अन्य समाजों में योग्य और अनुभवी विद्वानों की कमी है?या फिर यह पद अनौपचारिक रूप से किसी एक समाज तक सीमित कर दिया गया है?इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य की राजनीतिक और सामाजिक फिज़ा में नई बहस छेड़ दी है। अब देखना होगा कि सरकार इस आलोचना को गंभीरता से लेती है या राजभाषा आयोग पर “ब्राह्मण आयोग” होने का ठप्पा और गहराता चला जाएगा।