कबीरधाम/ धनंजय साहू/ ब्यूरो चीफ ,सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष पद पर प्रभात मिश्रा की नियुक्ति के बाद प्रदेशभर में सियासी, सामाजिक और वैचारिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। खासकर सोशल मीडिया पर यह मुद्दा जोर पकड़ता जा रहा है कि यदि यह नियुक्ति ब्राह्मण समाज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े चेहरे को ही देनी थी, तो फिर बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला के बड़े पिता जी एवं वरिष्ठ साहित्यकार नंदकिशोर शुक्ला को अध्यक्ष क्यों नहीं बनाया गया?सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लगातार यह सवाल उठाया जा रहा है कि नंदकिशोर शुक्ला न केवल ब्राह्मण समाज से आते हैं, बल्कि उनका छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक गतिविधियों से वर्षों पुराना और गहरा जुड़ाव रहा है। इसके बावजूद उन्हें दरकिनार कर किसी अन्य चेहरे को आगे बढ़ाया जाना कई लोगों को समझ से परे लग रहा है।आलोचकों का कहना है कि राजभाषा आयोग का उद्देश्य केवल औपचारिक नियुक्ति करना नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी भाषा और लोकसंस्कृति को मजबूत करना है। ऐसे में यदि चयन का आधार सामाजिक वर्ग या वैचारिक पृष्ठभूमि ही था, तो फिर छत्तीसगढ़ी भाषा के लिए समर्पित रहे नंदकिशोर शुक्ला जैसे अनुभवी और सम्मानित नाम पर गंभीरता से विचार क्यों नहीं किया गया?इस मुद्दे ने अब केवल साहित्यिक बहस का रूप नहीं लिया, बल्कि इसे राजनीतिक चयन और सामाजिक संतुलन से जोड़कर भी देखा जा रहा है। कई सोशल मीडिया यूज़र्स यह भी लिख रहे हैं कि राजभाषा आयोग में बार-बार एक ही सामाजिक वर्ग से अध्यक्ष बनाए जाने से यह संस्था “समावेशी” होने के बजाय “सीमित दायरे” में सिमटती जा रही है।वहीं, कुछ लोगों का मानना है कि यह नियुक्ति संगठनात्मक संतुलन के तहत की गई है, लेकिन इसके बावजूद योग्य और अनुभवी नामों की अनदेखी होना सवालों को जन्म देता है। चर्चाओं में यह बात भी प्रमुखता से सामने आ रही है कि क्या राजभाषा आयोग वास्तव में छत्तीसगढ़ी भाषा के हित में फैसले ले रहा है, या फिर यह पद केवल राजनीतिक और वैचारिक समायोजन का माध्यम बनता जा रहा है।फिलहाल, राजभाषा आयोग के अध्यक्ष चयन को लेकर उठा यह विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शासन और आयोग इस असंतोष पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं और क्या भविष्य में ऐसे निर्णयों में छत्तीसगढ़ी भाषा, जमीनी कार्य और सामाजिक संतुलन को प्राथमिकता दी जाएगी।